Business Me Barkat Ka Raaz |

4 उसूल जो कारोबार में बरकत लाते हैं

Business Me Barkat Ka Raaz: अगर आप कारोबारी और Business Man हैं तो यक़ीनन आप चाहते होंगे कि आपकी तिजारत में मुनाफ़ा (Profit) हो, ग्राहक भी बढ़ें और कारोबार में सुकून और बरकत रहे। और हर Business Man यही चाहता है, लेकिन ज़रा ठहर का सोचिये! कि क्या कारोबार की कामयाबी यही है कि महीने के आखिर में कितना पैसा बचा और कितना प्रॉफिट हुआ।

अगर हम इसी चीज़ को इस्लाम की नज़र से देखें तो आपके दिमाग़ में सिर्फ़ ये सवाल नहीं आएगा कि कितना profit हुआ, बल्कि ये आएगा कि आपकी कमाई का ज़रिया क्या है? कारोबार में ईमानदारी कितनी है? Customer के साथ इंसाफ़ किया जा रहा है या नहीं? और जो प्रॉफिट हो रहा है, उसमें हलाल और हराम की पाबंदी का कितना लिहाज़ है?

अगर आप सहाबा-ए-किराम (र.अ.) को देखें तो वहां ऐसी ऐसी शानदार मिसालें मिलती हैं कि इन्सान दंग रह जाये वो ऐसी मिसालें हैं, जिन्होंने ख़ुद से यही सवाल पूछे और तिजारत में फिर बरकत की कोई इन्तेहा न रही। और उनके कारोबार में वो फ़ायदा हुआ जिसका मिसाल आज भी दी जाती है, उनमें सबसे पहले हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ (र.अ.) का नाम खास तौर पर आता है। वो उन दस सहाबा में से थे जिन्हें दुनिया ही में जन्नती होने की खुशखबरी दी गई थी।

आगे चल कर हम आपको हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ (र.अ.) के 4 उसूल बताने वाले हैं लेकिन उससे पहले ये ध्एयान रखिये कि मुसलमान के लिए कारोबार करना सिर्फ़ कमाई का ज़रिया नहीं होता, बल्कि यही कारोबार इबादत भी बन जाता है अगर कमाई का तरीका हलाल हो, लेन-देन में ईमानदारी हो और किसी का हक़ न मारा जाए।

हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ (र.अ.) के Business में इतनी बरकत युन्ही नहीं आई, वो तिजारत में इन 4 उसूल को अपनाये हुए थे जिसका नतीजा ये हुआ कि अल्लाह ने उनके कारोबार को वहां जहाँ इन्सान को ख्वाबों में भी पहुंचना मुश्किल होता है, तो अगर आप चाहते हैं कि कारोबार इबादत बन जाये और उसमें सिर्फ़ पैसा नहीं, बल्कि सुकून और बरकत भी हो, तो कारोबार के इन चार उसूलों को अपने कारोबार का हिस्सा ज़रूर बनाइए।

4 उसूल जो कारोबार में बरकत लाते हैं

1.मुनाफ़ा छोटा हो या बड़ा, फ़ौरन बेच दिया करते थे

हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ رضي الله عنه से यह बात मनक़ूल है कि वे मुनाफ़े को ठुकराते नहीं थे और बिक्री में बेवजह देर नहीं करते थे। उनके कारोबार की कामयाबी का की वजह ये भी थी, तो इसमें हर कारोबारी के लिए एक अहम सबक है कि हर सौदे में बहुत बड़ा मुनाफ़ा हासिल करने की ज़िद नहीं करनी चाहिए। बल्कि कभी-कभी छोटा लेकिन साफ़ और हलाल मुनाफ़ा बेहतर होता है उस बड़े मुनाफ़े से जिसके लिए महीनों तक माल रोककर रखना पड़े।

आज कारोबार में अक्सर ऐसा होता है कि दुकानदार किसी चीज़ के दाम बढ़ने का इंतज़ार करता रहता है। हाँ, वो अलग बात है कि अगर माल वाक़ई किसी जायज़ वजह से रोकना पड़ जाये, लेकिन लोगों की ज़रूरत की चीज़ों को गलत तरीके से रोककर महंगा बेचने की कोशिश इस्लामी कारोबारी अख़लाक़ के खिलाफ़ है।

नोट: बरकत का ताल्लुक सिर्फ़ मुनाफ़े की रकम से नहीं, बल्कि उसके हलाल होने से है।

2. . न उधार ख़रीदा, और न उधार बेचा

हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ رضي الله عنه से जुड़ी मशहूर रिवायत में “उधार पर न बेचने” का ज़िक्र मिलता है। लेकिन ध्यान रहे कि इसका मतलब यह नहीं कि इस्लाम में उधार हराम है, इस्लामी फ़िक़्ह में उधार और deferred payment के कई जायज़ रूप मौजूद हैं। लेकिन एक कारोबारी के लिए कर्ज़ और उधार की ज़िम्मेदारी को हल्का समझना भी ठीक नहीं। क्यूंकि नबी ﷺ ने कर्ज़ के बारे में सख़्त चेतावनी दी है।

हदीस में आता है:

“मोमिन की जान उसके कर्ज़ के साथ मुअल्लक़ रहती है, जब तक उसका कर्ज़ अदा न कर दिया जाए।”

जामे तिर्मिज़ी 1078

इसका मतलब यह है कि कारोबारी को कर्ज़ लेते वक़्त अदायगी की प्लानिंग और ज़िम्मेदारी को गंभीरता से देखना चाहिए। कारोबार बढ़ाने के लिए लिया गया कर्ज़ अगर समझदारी और जायज़ तरीके से हो तो उसका हुक्म अलग हो सकता है, लेकिन बिना प्लानिंग के कर्ज़ का बोझ बढ़ाते जाना और ज़्यादा उधार देते जाना भी कारोबार को परेशानी में डाल सकता है।

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3. माल का ऐब (नुक़्स) कभी नहीं छुपाया

यह हलाल तिजारत का सबसे अहम उसूल है कि अगर किसी सामान में कोई खराबी है, कोई हिस्सा टूटा हुआ है, उसकी quality कम है या उसमें कोई ऐसा ऐब है जिसे ग्राहक जानना चाहेगा, तो उसे छिपाकर बेचना अमानतदारी के खिलाफ़ है।

एक बार नबी करीम ﷺ अनाज के ढेर के पास से गुज़रे, आपने अनाज को हाथ में लेकर देखा तो नीचे का हिस्सा गीला पाया, और बेचने वाले से पूछा तो उस ने बताया कि ये बारिश की वजह से है, तो आपने फ़रमाया कि उसे ऊपर क्यों नहीं रखा ताकि लोग देख सकें, और फिर धोखे से रोकते हुए फ़रमाया:

“जो धोखा दे, वह मुझमें से नहीं।” (सहीह मुस्लिम 102)

आज यह उसूल सिर्फ़ offline दुकान तक ही नहीं है, बल्कि ऑनलाइन कारोबार में भी यही बात लागू होगी:

• Product की असली तस्वीर इस्तेमाल करें।
• इस्तेमाल किए हुए सामान को नया बताकर न बेचें।
• Defect हो तो साफ़ लिखें।
• नकली review न बनाएं।
• Product की quality के बारे में झूठे दावे न करें।
• Customer को ऐसी जानकारी न छिपाएं जो उसके फैसले पर असर डाल सकती हो।

याद रखिए, ग्राहक को एक बार धोखा देकर पैसा कमाया जा सकता है, लेकिन लंबे समय तक अमानतदारी से ही भरोसा क़ायम रखा जा सकता है।

4. ईमानदारी और हलाल कमाई का लिहाज़ हर वक़्त रखा

इस्लाम में तिजारत सिर्फ़ पैसा कमाने का ज़रिया नहीं, बल्कि इंसान के अख़लाक़ का इम्तिहान भी है, इसीलिए नबी करीम ﷺ ने सच्चे और अमानतदार ताजिर की बड़ी फ़ज़ीलत बयान की है, चुनांचे हदीस में आता है कि सच्चा और अमानतदार ताजिर नबियों, सिद्दीक़ीन और शुहदा के साथ होगा।

इसका मतलब यह है कि अगर एक मुसलमान अपनी तिजारत में सच्चाई और अमानतदारी को अपनाता है तो उसका कारोबार भी इबादत का ज़रिया बन सकता है, बस शर्त ये है कि कमाई का तरीका जायज़ हो और वह अपने कारोबारी फ़र्ज़ पूरे करे।

और ईमानदारी का मतलब सिर्फ़ ये नहीं होता कि आप झूट न बोलें। बल्कि ईमानदारी में ये चीज़ें भी शामिल है:

• सही वजन करना।
• सही quantity देना।
• सही quality बताना।
• कीमत में साफ़गोई रखना।
• ग्राहक से किए वादे को पूरा करना।
• हिसाब-किताब साफ़ रखना।
• हराम कमाई से बचना।
• किसी की मजबूरी का नाजायज़ फायदा न उठाना।

कुरआन में नाप-तौल में कमी करने वालों के लिए कड़ी चेतावनी आई है। आप पढ़के तो देखें (सूरह अल-मुतफ़्फ़िफ़ीन 83:1–3) इसी तरह तिजारत में सच्चाई और तक़वा की अहमियत पर नबी ﷺ की कई हदीसें हैं। यानि कारोबारी की असली पहचान सिर्फ़ उसकी दुकान, ब्रांड या बिक्री नहीं, बल्कि उसका अख़लाक़ भी है। मतलब अगर ग्राहक को पता हो कि यह व्यक्ति गलत बात नहीं बताएगा, ऐब नहीं छुपाएगा और वादे के मुताबिक़ माल देगा, तो यह भरोसा खुद एक बड़ी कारोबारी पूंजी बन जाता है।

आज से इन चार बातों को अपने कारोबार में लागू करें

1. कमाई से पहले उसका ज़रिया देखिए

हर मुनाफ़ा कामयाबी नहीं है, अगर कमाई का तरीका नाजायज़ है तो रकम बढ़ने के बावजूद असल बरकत हासिल नहीं होती।

2. ग्राहक को सिर्फ़ ग्राहक नहीं, अमानत समझिए

ग्राहक का भरोसा भी एक ज़िम्मेदारी है, उसकी अनजानियत का फायदा उठाना कारोबारी ईमानदारी के खिलाफ़ है।

3. छोटी कमाई को कमतर न समझें

हलाल कमाई कम हो सकती है, लेकिन उसमें सुकून होता है। ज्यादा कमाने की चाह अगर है तो हलाल तरीके से ही करना चाहिए अगर ये चाह इंसान को गलत रास्ते पर ले जाए तो वही मुनाफ़ा नुकसान और बे बरकती में बदल सकता है।

4. कारोबार में रिकॉर्ड साफ़ रखें

खरीद, बिक्री, खर्च, उधार और भुगतान का हिसाब साफ़ रखें। कारोबारी पारदर्शिता सिर्फ़ business management के लिए नहीं, बल्कि अमानतदारी के लिए भी जरूरी है।

असल बरकत कहाँ है?

बरकत का मतलब सिर्फ़ यह नहीं कि पैसा बहुत ज्यादा हो जाए। कभी कम कमाई में भी इंसान के घर में इतना सुकून होता है कि खर्च संभल जाता है, दिल परेशान नहीं होता और कमाई के बारे में शर्मिंदगी नहीं होती।

और इसके उलट कभी कभार पैसा बहुत है लेकिन इसके बावजूद बेचैनी, झगड़े, बीमारी, कर्ज़ और तरह-तरह की परेशानियाँ इंसान को घेरे रहती हैं। इसलिए एक मुसलमान कारोबारी के लिए असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “मैं कितना कमा रहा हूँ?” बल्कि यह भी होना चाहिए “मैं कैसे कमा रहा हूँ?”

नतीजा

हलाल तिजारत की बुनियाद सिर्फ़ मुनाफ़ा नहीं, बल्कि ईमानदारी, अमानतदारी और अल्लाह का डर है।

मुनाफ़ा कमाइए, लेकिन हलाल तरीके से।
ग्राहक बनाइए, लेकिन धोखे से नहीं।
कारोबार बढ़ाइए, लेकिन अमानतदारी छोड़कर नहीं।
और कमाई की तलाश में बरकत को मत भूलिए।

क्योंकि हलाल कमाई शायद हमेशा सबसे बड़ी रकम न हो, लेकिन वही कमाई इंसान के लिए सुकून, इज़्ज़त और अल्लाह की रज़ा का ज़रिया बन सकती है।