5 Habits That Can Transform Your Life |
5 आदतें जो आपकी ज़िंदगी बदल सकती हैं
5 Habits That Can Transform Your Life : भाइयों! ये ज़िन्दगी है, यहाँ तक़रीबन हर इन्सान को अपनी ज़िंदगी में अच्छे और बुरे वक़्त का सामना ज़रूर करना पड़ता है, और कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अब कोई रास्ता नहीं बचा, और हर तरफ से दरवाजे बंद हैं, अब ऐसे में इन्सान क्या करे, किसी से मदद माँगना उसकी मजबूरी बन जाती है, और खुद पर भरोसा डगमगाने लगता है। |
अगर आप भी ऐसा महसूस करते हैं, तो आज की ये पोस्ट आपके लिए बड़ी मददगार साबित हो सकती है, क्यूंकि आज मैं आपको एक ऐसी औरत की कहानी सुनाने वाला हूँ जो सऊदी अरब में एक मस्जिद के बाहर हर जुमे को मदद माँगा करती थी, लेकिन फिर एक इमाम साहब ने उसे पैसे देने के बजाय कुछ ऐसा दिया जिसने उसकी पूरी ज़िंदगी ही बदल दी ।
एक ऐसी सच्ची और दिल को छू लेने वाली कहानी
इमाम साहब फरमाते हैं “मैं जब भी जुमे की नमाज़ पढ़ाके बाहर निकलता, तो मस्जिद के दरवाज़े पर एक औरत खड़ी मिलती, उसकी गोद में छोटा बच्चा होता और आँखों में शर्म और मजबूरी भी। वो लोगों से कहती “अल्लाह के वास्ते मेरी मदद करो।” तो एक दिन मैंने उससे पूछ ही लिया, “बेटी, क्या हुआ? घर में कोई नहीं क्या?”
तो उसने जो कहानी सुनाई, वो दिल को छू लेने वाली थी।
उसने बताया “उसका शौहर उसके साथ नहीं है और माँ-बाप दूसरे शहर में हैं। काम करने निकलती हूँ तो लोग कहते हैं “पहले बच्चे को कहीं रखवा कर आओ।” और मैं पर्दे वाली, इज्जतदार औरत किसी ऐसे घर में काम करने को भी तैयार नहीं हूँ, जहाँ मुझे गलत नजरों से देखा जाए। तो आखिरकार,मुझे मजबूरन हाथ फैलाना ही पड़ा।
उसने इमाम साहब से कहा, “आप मुझे कुछ ऐसा बताइए जिससे अल्लाह मेरी मुश्किलें हल कर दे।”
5 Habits That Can Transform Your Life
इमाम साहब ने दिए पाँच नुस्खे
इमाम साहब ने उस औरत को पैसे नहीं दिए लेकिन उन्होंने उसे एक रास्ता दिखाया। यानि पाँच ऐसे काम बताये जो कोई भी इंसान हर रोज़ कर सकता है और जिनके करने पर बदला और इनआम मिलने का वादा खुद कुरान और हदीस में मौजूद है।
पहला अमल : गुनाहों से बचो
इमाम साहब ने कुरान की वो आयत सुनाई जिसमें अल्लाह कहता है
وَمَنْ يَتَّقِ اللَّهَ يَجْعَلْ لَهُ مَخْرَجًا وَيَرْزُقْهُ مِنْ حَيْثُ لَا يَحْتَسِبُ
“जो कोई अल्लाह से डरेगा (तक़वा इख्तियार करेगा) अल्लाह उसके लिए मुश्किलों से निकलने का रास्ता बना देगा और
उसे वहाँ से रिज़्क देगा जहाँ से उसे गुमान भी न हो।”
(सूरह अत-तलाक़: 2-3)
यानी बात सीधी है कि अगर हम गुनाहों से बचते हैं और अल्लाह का लिहाज़ करते हैं, तो अल्लाह खुद हमारी परेशानियाँ दूर करने और ज़िन्दगी बदलने की ज़िम्मेदारी ले लेते हैं, और यह अल्लाह का वादा है जो हमेशा सच होता है। तो सबसे पहले तो अपने गुनाहों पर गौर करो और उनको छोड़ने की कोशिश में लग जाओ, क्यूंकि गुनाह हमारे दुश्मन हैं, ये हमारे रास्ते की बड़ी रुकावट हैं ।
दूसरा अमल : खूब इस्तिगफार करो
इस्तिगफार यानी अल्लाह से माफी माँगना, और अगर कोई ग़लती हो जाये तो उसके लिए शर्मिंदा होना और आइन्दा ना करने का पक्का इरादा करना, और इसके फ़ायदे के बारे में कुरान में आता है कि “हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी कौम से कहा था “इस्तिगफार करो, अल्लाह तुम पर मूसलाधार बारिशें बरसाएगा, तुम्हें माल देगा, औलाद देगा, तुम्हारे खेत हरे-भरे होंगे।”
فَقُلْتُ اسْتَغْفِرُوا رَبَّكُمْ إِنَّهُ كَانَ غَفَّارًا يُرْسِلِ السَّمَاءَ عَلَيْكُمْ مِدْرَارًا وَيُمْدِدْكُمْ بِأَمْوَالٍ وَبَنِينَ
तर्जुमा: “मैंने कहा: अपने रब से माफी माँगो, बेशक वह बड़ा माफ़ करने वाला है। वह तुम पर खूब बारिश बरसाएगा और माल
व औलाद से तुम्हारी मदद करेगा।”
(सूरह नूह: 10-12)
और हदीस में भी इसके फ़ायदों पर रौशनी डाली गयी है
مَنْ لَزِمَ الِاسْتِغْفَارَ جَعَلَ اللَّهُ لَهُ مِنْ كُلِّ هَمٍّ فَرَجًا وَمِنْ كُلِّ ضِيقٍ مَخْرَجًا وَرَزَقَهُ مِنْ حَيْثُ لَا يَحْتَسِبُ
तर्जुमा: “जो शख्स इस्तिग़फ़ार को अपना मामूल बना ले, अल्लाह उसके हर ग़म से निकलने का रास्ता और हर तंगी से छुटकारा
अता फरमाता है तथा उसे ऐसी जगह से रिज़्क देता है जहाँ से उसे गुमान भी नहीं होता।”
(अबू दाऊद: 1518)
इस्तिगफार करना कोई बहुत बड़ा काम नहीं है, बस दिल से कहो “अस्तगफिरुल्लाह रब्बी मिन कुल्लि ज़म्बिव व अतूबु इलैह” या बस उर्दू में कहो “ऐ अल्लाह, मेरे सारे गुनाह माफ कर दे, मैं सच्ची तौबा करता हूँ।” अगर कोई तीन बार भी यह पढ़े, तो हदीस कहती है “समंदर की झाग के बराबर गुनाह भी माफ हो जाते हैं।

तीसरा अमल : दुरूद शरीफ खूब पढ़ो
हदीस में आता है
مَنْ صَلَّى عَلَيَّ صَلَاةً صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ بِهَا عَشْرً ا
तर्जुमा: “जो मुझ पर एक बार दुरूद भेजता है, अल्लाह उस पर दस रहमतें नाज़िल फरमाता है।”
(सहीह मुस्लिम: 408)
नबी करीम ﷺ पर दुरूद भेजना बहुत अज़ीम इबादत है, और इसके बदले में अल्लाह उस पर दस रहमतें नाज़िल फरमाता है। हज़रत उबै बिन काब़ (रज़ि.) की रिवायत में आता है कि
दुरूद की कसरत यानि दुरूद का ख़ूब पढ़ना इंसान को फ़िक्रों और परेशानियों से दूर करता है। इसलिए मोमिन
को चाहिए कि वह रोज़ाना कम से कम 100 बार दुरूद शरीफ़ का पढने का एहतिमाम करे
और अपने दिल को नबी ﷺ की मुहब्बत से रोशन रखे।
इसमें वक्त कितना लगता है? मुश्किल से 5 से दस मिनट। लेकिन उसका असर? वो इमाम साहब की इस कहानी में खुद सामने आता है।
चौथा अमल : “ला हौल वला कुव्वता” खूब पढ़ो
यह कलमा “ला हौल वला कुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलिय्यिल अज़ीम” को “हौकला” भी कहते हैं।
अरबी: لَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ
तर्जुमा: “गुनाहों से बचने और नेक काम करने की ताक़त सिर्फ अल्लाह की तौफ़ीक़ से है।”
इसके बारे में नबी ﷺ ने फरमाया:
أَلَا أَدُلُّكَ عَلَى كَنْزٍ مِنْ كُنُوزِ الْجَنَّةِ؟ لَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ
“क्या मैं तुम्हें जन्नत के ख़ज़ानों में से एक ख़ज़ाना न बताऊँ? ‘ला हौल वला कुव्वता इल्ला बिल्लाह’।”
(सहीह बुख़ारी: 6384)
इस कलमे का मतलब है कि गुनाह से बचने और नेक काम करने की ताक़त सिर्फ अल्लाह की तरफ से मिलती है। यह बंदे को अपनी बेबसी और अल्लाह की कुदरत का एहसास दिलाता है।
और कुछ जगह ये रिवायत भी मिलती है नबी ﷺ का फरमान है कि इस कलमे में 99 बीमारियों का इलाज है, और सबसे आसान बीमारी जो यह दूर करती है वो है, रिज़्क की तंगी। रोज़ाना 100, 200, 300 बार जितना हो सके इसे पढ़ें। चलते-फिरते, काम करते-करते, सोने से पहले। यह ज़बान पर भी आसान है और दिल को भी सुकून देता है।
पाँचवाँ अमल : सदका करो
अरबी: الصَّدَقَةُ تُطْفِئُ الْخَطِيئَةَ كَمَا يُطْفِئُ الْمَاءُ النَّارَ
तर्जुमा: “सदक़ा गुनाहों को इस तरह मिटा देता है जैसे पानी आग को बुझा देता है।”
(तिर्मिज़ी: 614)
एक दूसरी हदीस
دَاوُوا مَرْضَاكُمْ بِالصَّدَقَةِ
तर्जुमा: “अपने बीमारों का इलाज सदक़े के ज़रिए करो।”
(अल-बैहक़ी, हसन लिग़ैरिहि)
क्हयूंकि हदीस ही कहती है कि सदक़ा बलाओं को टालता है ” यानी जब बुरा वक्त हो, जब बीमारी हो या कोई परेशानी हो तो उस वक़्त इलाज तो करो लेकिन सदक़ा बिलकुल भी मत भूलो क्यूंकि उस वक्त सदका देना दवा का काम करता है।
और सदका कोई बड़ी रकम नहीं होती, बस आपको आपनी हैसियत के हिसाब से देना होता है इसलिए एक रुपया भी सदका है अगर सच्चे दिल से दिया जाये, एक तकलीफदेह इंसान की मदद करना भी सदका है। और किसी प्यासे को पानी पिलाना भी सदका है।
फिर क्या हुआ उस औरत के साथ?
उस औरत ने इन पाँचों कामों पर अमल शुरू किया। इमाम साहब कहते हैं “एक-दो हफ्ते तो वो नजर आई, लेकिन फिर मस्जिद के बाहर से गायब हो गई।” इमाम साहब को फ़िक्र हुई तो उन्होंने उसी मोहल्ले के एक मुकतदी से पूछा तो जवाब सुनकर वो हैरान रह गए उसने बताया कि “अरे, आपको नहीं पता? उसकी तो शादी हो गई कुछ हफ़्तों पहले!”
लेकिन शादी कैसे हुई? यह भी कम हैरतअंगेज़ नहीं है।
एक नौजवान ने ख्वाब देखा। जिसमें उसे बताया गया कि एक दूर की रिश्तेदार मुश्किल में है, उसकी मदद करो। उसने अपनी माँ को ख्वाब बताया। तो उसकी माँ उसके घर गई, उसे पसंद कर लिया और बेटे से कहा “मैंने आज तक तुमसे कोई दरखास्त नहीं की यह एक दरखास्त है, इस लड़की से शादी कर लो।
” बेटे ने माँ की बात मान कर कहा “माँ, मैं राजी हूँ।” फिर उसका निकाह हो गया ।
सबसे ज़रूरी बात : उसने पाँचों काम नहीं छोड़े
जब उस औरत से पूछा गया “अब तो सब ठीक हो गया, अब क्या करती हो?” तो उसने जो जवाब दिया वो बहुत गहरा है। उसने कहा “जिन पाँच कामों की वजह से अल्लाह ने मेरी मुश्किल हल की, मैं उन्हें क्यों छोड़ूँ?”
मैं आज भी वो पाँचों काम करती हूँ। शौहर जो जेब खर्ची देते हैं, उससे मैं सदका करती हूँ। और बाकी चारों अमल इस्तिगफार, दुरूद, हौकला, गुनाहों से परहेज़ वो सब मेरी ज़िंदगी का एक हिस्सा बन गए हैं जिन्हें मैं कभी नहीं छोडती हूँ।
आपके लिए एक छोटा सा सबक
यह कहानी सुनाने का मकसद यह नहीं कि आप भी तीन-चार हफ्तों में अपनी मुश्किलें हल होने का इंतजार करें। हर इंसान का वक्त अल्लाह ने अलग रखा है।
लेकिन इस कहानी का सबक बिल्कुल साफ है कि अल्लाह के बताए रास्तों पर चलना शुरू करो बस ध्यान ये रखो कि नतीजा उसके हाथ में है, लेकिन कोशिश तुम्हारे हाथ में है।
आज से कैसे शुरू करें?
• इस्तिग़फ़ार: रोज़ 100 बार।
• दुरूद शरीफ़: रोज़ 100 बार।
• لا حول ولا قوة إلا بالله: चलते-फिरते जितना हो सके।
• सदक़ा: हफ्ते में कम से कम एक बार।
• गुनाहों से परहेज़: एक गुनाह चुनें और उसे छोड़ने की कोशिश शुरू करें।
अगर यह कहानी आपको पसंद आई और आपको लगता है कि किसी और को भी इससे फायदा हो सकता है, तो इसे ज़रूर शेयर करें। एक छोटी सी नसीहत कभी-कभी पूरी ज़िंदगी बदल देती है।

