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Islam Me Zina Kyu Haraam Hai? | इस्लाम में ज़िना क्यों हराम है?

Islam Me Zina Kyu Haraam Hai?

Islam Me Zina Kyu Haraam Hai? |

इस्लाम में ज़िना क्यों हराम है?

Islam Me Zina Kyu Haraam Hai? : ज़िना क्यों हराम है? क्या इस्लाम ने इसे यूँ ही मना कर दिया है, या इसके पीछे कोई गहरी हिकमत भी छिपी है? अगर इस सवाल का जवाब आपके पास नहीं है, तो आइए इसे साथ मिलकर समझते हैं। एक बात याद रखिये! इस्लाम किसी चीज़ को बिला वजह हराम नहीं ठहराता और न ही बेवजह किसी पर पाबंदी लगाता है।

लेकिन अगर इस्लाम किसी अमल को हराम कह दे—“हराम” मतलब सख्ती से मना—तो ज़रूर उसके पीछे कोई हिकमत होती है, उसके पीछे इंसान की इज़्ज़त, हया, परिवार की सलामती और पूरे समाज और सोसाइटी की भलाई छिपी होती है। वैसे ही ज़िना भी ऐसा ही एक गुनाह है, जिससे सिर्फ़ एक शख्स नहीं, बल्कि पूरा परिवार और समाज मुतास्सिर (प्रभावित) होता है।

तो आइए, कुरआन और हदीस की रोशनी में समझते हैं कि ज़िना क्यों हराम है, इससे क्या नुक़सान होते हैं और अल्लाह ने इससे बचने के लिए हमें क्या रहनुमाई दी है।

ज़िना किसे कहते हैं?

इस्लाम में निकाह के बिना किसी गैर-महरम मर्द और औरत के बीच जिस्मानी ताल्लुक़ (शारीरिक संबंध) बनाने को ज़िना कहते हैं यह एक बड़ा गुनाह है, जिससे कुरआन और हदीस में सख्ती से मना किया गया है।

Islam Me Zina Kyu Haraam Hai?

इस्लाम ने हमेशा इंसान की इज़्ज़त, हया की हिफाज़त की है, और इसी वजह से उसने ज़िना को सबसे बड़ा गुनाह बताया है,  ऐसा भी नहीं है कि इसको गुनाह बताने की वजह सिर्फ मज़हबी है, बल्कि इसकी वजह इंसानी और समाजी भी है। क्यूंकि यह गुनाह सिर्फ एक शख़्स को नहीं, पूरे घर को, बल्कि पूरे समाज को तबाह करता है, और ज़िना सिर्फ़ एक गुनाह ही नहीं है, बल्कि इंसान की इज़्ज़त, हया और पाकीज़गी पर हमला है। और यही वजह है कि इस्लाम ने इसे कबाइर (बड़े गुनाहों) में शामिल किया है और इसके करीब जाने वाले रास्तों से भी बचने का हुक्म दिया है।

लेकिन अफ़सोस, आज का दौर ऐसा है जहाँ ज़िना की तरफ़ बुलाने वाली चीज़ें हर तरफ़ मौजूद हैं। एक ग़लत नज़र, एक ग़लत दोस्ती या एक ग़लत कदम भी इंसान को ऐसे रास्ते पर ले जा सकता है जिसका अंजाम दुनिया और आख़िरत दोनों में नुकसान है।

मगर इस्लाम की खूबसूरती यह है कि वह सिर्फ़ मना ही नहीं करता, बल्कि समझाता भी है और गुनाह से बचने का रास्ता भी दिखाता है। मिसाल के तौर पर रसूलुल्लाह ﷺ की एक ऐसी हिकमत भरी नसीहत है जिसने एक नौजवान के दिल से ज़िना की चाहत को हमेशा के लिए दिल से निकाल दिया। आइए, उस ईमान अफ़रोज़ वाक़िए से सबक हासिल करते हैं।

Islam Me Zina Kyu Haraam Hai?

एक दिल हिला देने वाला वाक़िया 

एक दिन एक नौजवान रसूलुल्लाह ﷺ की मजलिस में आया उस पर जवानी का जोश था, उसका नफ्स उससे बार बार जिना की तरफ़ जाने को कह रहा था, तो वो आखिर रसूलुल्लाह ﷺ के पास आया और कहा: “या रसूलल्लाह! मुझे ज़िना करने की इजाज़त दीजिए।”

सहाबा को गुस्सा आया। मगर नबी करीम ﷺ ने उसे डांटा नहीं, मारा नहीं, भगाया नहीं। बल्कि उसे पास बिठाया और इतने प्यार से, इतनी हिकमत से बात की कि वो नौजवान हमेशा के लिए बदल गया।

नबी करीम ﷺ ने पूछा: “क्या ये काम तुम अपनी माँ के लिए पसंद करोगे?”

उसने कहा: “नहीं, हरगिज़ नहीं!”

नबी करीम ﷺ ने पूछा: “अपनी बेटी के लिए?”

उसने कहा: “कभी नहीं!”

नबी करीम ﷺ ने पूछा: “अपनी बहन, खाला, फूफी के लिए?”

उसने कहा: “नहीं, या रसूलल्लाह!”

तब नबी ﷺ ने फरमाया: “लोग भी अपनी माँ, बेटी, बहन और घर की औरतों के लिए यही सोचते हैं।” यानि लोग भी अपनी माँ, बेटी, बहन और घर की औरतों के लिए इसे पसंद नहीं करते।”

बस इतना ही काफी था कि उसके दिल की दुनिया ही बदल गयी,  कोई लंबा लेक्चर नहीं, कोई सख्त सज़ा नहीं, बस एक नपी तुली बात चीत, “अगर तुम नहीं चाहते कि तुम्हारी बहन, बेटी, फूफी के साथ कोई जिना करे, तो जिसके साथ तुम जिना करोगे वो भी तो किसी की माँ, बेटी, बहन है” सिर्फ एक आईना दिखाया गया। जिसमें उस नौजवान ने खुद को देख लिया और उसकी समझ में आ गया ।

नबी ﷺ की दुआ सीने पर हाथ रखकर

फिर नबी ﷺ ने अपना मुबारक हाथ उस नौजवान के सीने पर रखा और दुआ की:

 

اللَّهُمَّ اغْفِرْ ذَنْبَهُ، وَطَهِّرْ قَلْبَهُ، وَحَصِّنْ فَرْجَهُ

 

“या अल्लाह! इसके गुनाह माफ़ कर, इसका दिल पाक कर, और इसकी शर्मगाह की हिफाज़त फरमा।”

उस दिन के बाद वो नौजवान कभी उस बुराई की तरफ़ पलटकर नहीं गया। नबी करीम स.अ. की एक दुआ ने वो काम कर दिया जो हज़ार नसीहतें नहीं कर सकती थीं।

ज़िना का असर सिर्फ शख़्सी नहीं, समाजी भी

मेरे अज़ीज़ों! ज़िना कोई छोटा गुनाह नहीं, बल्कि यह एक ऐसी आग है जो एक इंसान से शुरू होती है और पूरे ख़ानदान को जला कर राख कर देती है और इसका असर ये होता है कि :

• इज़्ज़तें तबाह होती हैं — खुद की भी, और घर की भी।

• रिश्ते टूटते हैं — भरोसा एक बार जाए तो मुश्किल से आता है।

• ईमान कमज़ोर होता है — दिल पर ज़ंग चढ़ती चली जाती है।

• अल्लाह का अज़ाब आता है — दुनिया में भी, आख़िरत में भी।

शैतान का तरीका

और शैतान बहुत ही बड़ा होशियार है, वो कभी किसी को एक दम से गुनाह में नहीं धकेलता। बल्कि धीरे-धीरे, आहिस्ता-आहिस्ता ले कर जाता है, जैसे

• पहले नज़र का गुनाह करवाता है — एक बार देखा, फिर दोबारा।

• फिर दिल में आगे बढ़ने के लिए ख्यालात पैदा करता है — जो चाह कर भी हटाए नहीं जाते।

• फिर तन्हाई के मौके के लिए उकसाता है — “बस एक बार”।

• और फिर आख़िरकार वो गुनाह करवा लेता है — जिसका पछतावा ज़िंदगी भर साथ रहता है। और आख़िरत में भी पीछा नहीं छोड़ता |

इसीलिए इस्लाम ने पहले कदम पर ही रोका है कि नज़रें झुकाओ, किसी के साथ तन्हाई से बचो क्योंकि जो पहला कदम रोक ले, वो आखिरी गुनाह से बच जाता है।

तौबा का दरवाज़ा हमेशा खुला है

लेकिन अगर कोई इस गुनाह में पड़ चुका है तो मायूस होने की ज़रूरत नहीं। अल्लाह माफ़ी का दरवाज़ा बंद नहीं करता । वो रहमान है, वो रहीम है।

“मगर जो तौबा करे, ईमान लाए, और अच्छे अमल करे, अल्लाह उनकी बुराइयों को नेकियों में बदल देता है।”

 

(क़ुरआन: सूरह फ़ुरकान 25:70)

सोचिए अल्लाह सिर्फ माफ ही नहीं करता, बल्कि बुराइयों को नेकियों में बदल देता है। यह रहमत है, यह उम्मीद है, और यही इस्लाम है।

जिना से बचने के 5 तरीक़े 

• नज़रें झुकाना :— यह पहला और सबसे ज़रूरी कदम है जो नज़र रोक ले, वो बहुत बड़ा मैदान जीत लेता है।

• तन्हाई से बचना :— जो गुनाह तन्हाई में होते हैं, वो महफ़िल में नहीं होते।

• पर्दे का एहतिमाम :— यह सिर्फ औरत के लिए नहीं, मर्द की नज़र के लिए भी है।

• नेक दोस्तों की सोहबत :— जो दोस्त अल्लाह की याद दिलाएं, वो असली दोस्त हैं।

• अल्लाह का ख़ौफ़ :— जब हर रास्ता बंद हो जाए, तब यही एक चीज़ बचाती है।

हलाल रास्ता शादी, सुकून का ज़रिया

इस्लाम ने ये कभी नहीं कहा कि जो ख्वाहिशें क़ुदरती तौर पर तुम्हारे दिल में पैदा हो रही हैं उनको दबा दो, बल्कि उसने इसके लिए हलाल रास्ता “निकाह” का हुक्म दिया। तो शादी सिर्फ जिस्मानी ज़रूरत नहीं बल्कि यह रूहानी सुकून का दरवाज़ा है, दीन और ईमान इसी से मुकम्मल होता है।

“हे जवानों की जमाअत! तुम में से जो क़ुदरत रखे, वो शादी कर ले, यह नज़र को झुकाती है

और शर्मगाह की हिफाज़त करती है।”

(हदीस-ए-पाक)

आख़िरी बात — दिल में उतार लीजिए

रसूलुल्लाह ﷺ की उस एक नसीहत ने एक नौजवान को बदल दिया था। आज यही नसीहत आपके लिए है कि जब भी कोई गलत ख्याल आए तो एक पल के लिए रुकिए। और उस नौजवान वाला सवाल खुद से पूछिए: “क्या मैं यह अपनी माँ और बहन के लिए पसंद करूंगा?” बस यह एक सवाल काफी है। और अगर कभी फिसल जाएं तो मायूस मत होइए। अल्लाह के पास जाइए, सच्चे दिल से तौबा कीजिए तौबा का दरवाज़ा कभी बंद नहीं होता।

اللَّهُمَّ اغْفِرْ ذُنُوبَنَا، وَطَهِّرْ قُلُوبَنَا، وَحَصِّنْ فُرُوجَنَا

 

“ऐ अल्लाह! हमारे गुनाहों को माफ़ फ़रमा, हमारे दिलों को पाक कर दे, और हमारी शर्मगाहों की हिफाज़त फ़रमा। आमीन।”

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