Namaz Ke Makrooh Waqt |

नमाज़ के 8 मकरूह वक़्त | कब नफ्ल (नफिल) पढ़ना मना है?

Namaz Ke Makrooh Waqt: ये तो हर कोई जानता है कि नमाज़ इस्लाम का सबसे अहम रुक्न है, और 24 घन्टों में जब भी तुम अल्लाह से जुड़ना चाहो तो जाये-नमाज़ बिछाओ और नमाज़ के लिए खड़े हो जाओ क्यूंकि नमाज़ ही वो ज़रिया है जिसमे तुम अल्लाह को अपने से करीब तर पाओगे |

लेकिन लेकिन लेकिन.. बहुत से लोगों को यह नहीं मालूम कि दिन-रात में कुछ ऐसे लम्हे भी आते हैं जब कोई भी नमाज़ नहीं पढ़ी जाती है क्यूंकि इन वक्तों में नमाज़ पढ़ना मना कर दिया गया है, चाहे नियत कितनी भी अच्छी क्यों न हो आप उन times में नमाज़ नहीं पढ़ सकते। और ख़ुद रसूलुल्लाह ﷺ ने अपने सहाबा को तीन ऐसे वक़्तों से मना फ़रमाया था। हज़रत उक़बा बिन आमिर रज़ि. की रिवायत है:

“तीन वक़्त ऐसे थे जिनमें रसूलुल्लाह ﷺ हमें नमाज़ पढ़ने और अपने मुर्दों को दफ़नाने से मना फ़रमाते थे, जब सूरज तुलू हो रहा हो यहाँ तक कि बुलंद हो जाए, जब सूरज ऐन दोपहर पर हो यहाँ तक कि ढल जाए, और जब सूरज ग़ुरूब होने के क़रीब हो यहाँ तक कि पूरी तरह डूब जाए।”
(सहीह मुस्लिम, हदीस: 831)

तो ये तो 3 टाइम्स ऐसे हैं जिनमे कोई नमाज़ नहीं पढ़ी सकती (फ़र्ज़, सुन्नत, नफ्ल) कोई भी नहीं पढ़ सकते, लेकिन इसी उसूल पर उलमा-ए-किराम ने कुछ और मौक़े भी बताए हैं, जहाँ नफ़िल, सुन्नत या कोई और नमाज़ पढ़ने की गुंजाइश नहीं। और ऐसा नहीं कि ये हुक्म बस यूँही दे दिया गया है बल्कि हर वक़्त के पीछे कोई न कोई हिकमत और हदीस की बुनियाद है, तो आइए, इन्हें तफ़सील से समझते हैं।

Makrooh Meaning In Hindi

मकरूह = नापसंद / मना किया हुआ
मकरूह वक़्त = वह वक़्त जिसमें नमाज़ पढ़ने से रोका गया हो।

1. फ़ज्र का पूरा वक़्त

फ़ज्र की फ़र्ज़ नमाज़ से पहले कोई नफ्ल नमाज़ नहीं पढ़ी जाएगी सिर्फ़ 2 रकात सुन्नत ही पढ़ी जाएगी, और वह भी इसलिए क्योंकि ख़ुद रसूलुल्लाह ﷺ इन दो रकातों को कभी नहीं छोड़ते थे। आपने फ़रमाया था:

“फ़ज्र की दो रकातें दुनिया और उसमें मौजूद हर चीज़ से बेहतर हैं।”
(सहीह मुस्लिम, हदीस: 725)

इसलिए इन दो रकातों के अलावा फ़ज्र की फ़र्ज़ नमाज़ से पहले या बाद में कोई और नफ्ल पढ़ना दुरुस्त नहीं। और इसकी वजह यह भी है कि फ़ज्र का वक़्त बहुत मुख़्तसर होता है, अगर कोई इसमें और नवाफ़िल जोड़ने लगे तो जमाअत छूटने या वक़्त निकल जाने का ख़तरा रहता है।

2. असर के फ़र्ज़ के बाद

असर के फ़र्ज़ से पहले जितनी भी चाहें नफ्ल पढ़ी जा सकती हैं, लेकिन फ़र्ज़ अदा होते ही यह दरवाज़ा बंद हो जाता है। रसूलुल्लाह ﷺ का इरशाद है:

“फ़ज्र की नमाज़ के बाद सूरज तुलू होने तक कोई नमाज़ नहीं, और असर की नमाज़ के बाद सूरज ग़ुरूब होने तक कोई नमाज़ नहीं।”
(सहीह बुख़ारी: 586، सहीह मुस्लिम: 827)

यानी अस्र के फ़र्ज़ के बाद से लेकर मग़रिब का वक़्त शुरू होने तक किसी भी नफ्ल की इजाज़त नहीं और यह पाबंदी इसलिए भी रखी गई ताकि सूरज ढलने के इस पूरे सिलसिले में मुसलमान किसी भी तरह सूरज को पूजने वाली क़ौमों की नक़ल से बचे।

Namaz Ke Makrooh Waqt

3. ख़ुत्बे के दौरान

जुमे, निकाह या ईद का ख़ुत्बा जब इमाम दे रहे हों, उस वक़्त कोई भी नफ़िल या सुन्नत पढ़ना जायज़ नहीं। ख़ुत्बे के दौरान ख़ामोशी और तवज्जो की इतनी अहमियत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

“जब इमाम ख़ुतबा दे रहा हो और तुमने अपने साथी से सिर्फ़ इतन कहा ‘चुप रहो’, तो भी तुमने ग़लती की।”
(सहीह बुख़ारी: 934، सहीह मुस्लिम: 851)

जब सिर्फ़ ‘चुप रहो’ कहना भी मना है, तो सोचिए नमाज़ में मशग़ूल हो जाना कितना बड़ा ख़लल होगा इसलिए ख़ुत्बा के दौरान कोई नमाज़ न पढ़ें।

4. जमाअत खड़ी हो जाने के बाद

जब जमाअत खड़ी हो जाये तो उस वक़्त सुन्नत या नफ्ल या कोई भी और नमाज़ मना हो जाती है, ख़ुद रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

“जब नमाज़ की इक़ामत हो जाए, तो फ़र्ज़ के सिवा कोई नमाज़ नहीं।”
(सहीह मुस्लिम, हदीस: 710)

सिर्फ़ फ़ज्र की सुन्नतों में एक गुंजाइश है कि अगर मस्जिद के किसी कोने में जल्दी से 2 रकात सुन्नत पढ़कर जमाअत में शामिल हो सकते हैं तो ठीक है, लेकिन अगर देर होने का ख़तरा हो और फ़र्ज़ छूट जाने का अन्देशा हो, तो सुन्नत छोड़कर सीधे जमाअत में शामिल हो जाना चाहिए क्यूंकि जमाअत की अहमियत सुन्नत से भी ऊपर है।

5. फ़र्ज़ का वक़्त तंग होना

अगर फ़र्ज़ नमाज़ का वक़्त बहुत कम बचा हो जैसे अस्र का वक़्त ख़त्म होने में सिर्फ़ चंद मिनट रह गए हों और आप ने अभी तक फ़र्ज़ अदा नहीं की तो ऐसी हालत में नफ़िल या सुन्नत में वक़्त ज़ाया न करें बल्कि फ़र्ज़ अदा करें, उसके बाद अगर वक़्त हो या सुन्नत वगैरा पढ़े जाने का टाइम है तो पढ़ सकते हैं, क्यूंकि इस्लाम में फ़र्ज़ की अदायगी सबसे ज़्यादा अहम है।

6. ईद की नमाज़ से पहले

ईद की नमाज़ से पहले मस्जिद में या घर में कोई भी नफ़िल पढ़ना मना है।

हज़रत इब्ने अब्बास रज़ि. फ़रमाते हैं कि नबी करीम ﷺ ईद के दिन, ईद की नमाज़ से पहले कोई नमाज़ नहीं पढ़ते थे

(सहीह बुख़ारी: 964)।

कई लोग मस्जिद पहुंचकर इशराक़ या चाश्त पढ़ने लगते हैं, यह तरीक़ा दुरुस्त नहीं, क्योंकि ईद की नमाज़ का अपना एक ख़ास मक़ाम और वक़्त है, जिसको किसी और नफ़िल से नहीं मिलाना चाहिए।

7. ईद की नमाज़ के बाद मस्जिद में

इसी हदीस का दूसरा हिस्सा यह भी है कि नबी करीम ﷺ ईद की नमाज़ के बाद, घर पहुंचने तक कोई नमाज़ नहीं पढ़ते थे। हाँ, घर लौटकर चाहें तो इशराक़ या चाश्त की नमाज़ पढ़ी जा सकती है।

8. दिल का बंटना

जहाँ दिल इधर-उधर भटक रहा हो जैसे तेज़ आवाज़ में टीवी या गाना चल रहा हो, या भूख-प्यास की शिद्दत हो वहाँ नमाज़ पढ़ना मकरूह है, चाहे वह फ़र्ज़ हो या नफ्ल।ख़ुद रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

“जब खाना हाज़िर हो और नमाज़ खड़ी हो जाए, तो पहले खाना खाओ।”
(सहीह बुख़ारी: 671، सहीह मुस्लिम: 557)

इससे साफ़ पता चलता है कि नमाज़ में दिल की हाज़िरी और सुकून कितना ज़रूरी है, इसलिए हमेशा ऐसी जगह और ऐसे वक़्त नमाज़ पढ़ने की कोशिश करें जहाँ दिल पूरी तरह अल्लाह की तरफ़ लगा रहे।

नतीजा

इन तमाम मकरूह वक़्तों के पीछे एक ही मक़सद है नमाज़ को उसकी असल शान, तरतीब और अदब के साथ अदा करना, न कि सिर्फ़ रस्म पूरी करना। यह पाबंदियाँ हमें सिखाती हैं कि इबादत में भी एक निज़ाम और तवज्जो होनी चाहिए। इसलिए इन बातों को याद रखिए:

❖ फ़र्ज़ नमाज़ हमेशा वक़्त पर पहले अदा करें, नफ़िल बाद में।
❖ सूरज तुलू और ग़ुरूब के वक़्त, और फ़ज्र-असर के फ़र्ज़ के बाद किसी भी नफ़िल से बचें।
❖ ख़ुत्बे और जमाअत के दौरान ख़ामोशी और तवज्जो ही असल अदब है।
❖ नमाज़ ऐसी जगह और ऐसी हालत में पढ़ें जहाँ दिल पूरी तरह अल्लाह की तरफ़ लगा रहे।

ऐ अल्लाह! हमें अपनी नमाज़ों को सही वक़्त पर, सही अदब के साथ अदा करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा। आमीन।