70 Hazaar Log Baghair Hisaab Jannat Me |
70 हज़ार लोग बग़ैर हिसाब के जन्नत
70 Hazaar Log Baghair Hisaab Jannat Me: क़यामत का दिन इतना हौलनाक होगा, कि हर शख़्स अपने होने वाले हिसाब किताब के ख़ौफ़ से काँप रहा होगा, पुल सिरात के नीचे जहन्नुम की आग भड़क रही होगी, और किसने अच्छे और बुरे आमाल किये हैं और कितने किये हैं, ये बताने के लिए हर इंसान का नामा-ए-आमाल फ़रिश्ते खोल रहे होंगे और उनके आमाल के हिसाब से जन्नत और जहन्नम का फ़ैसला किया जा रहा होगा|
लेकिन क्या आप जानते हैं! उस दिन कुछ ऐसे ख़ुशनसीब भी होंगे जिनका न तो हिसाब-किताब होगा और न तो वो रोके जायेंगे और न तोले जाएँगे | वो बस अपनी क़ब्रों से उठेंगे और सीधे जन्नत की तरफ़ रवाना हो जाएँगे। उस वक़्त हर किसी के ज़हन में एक सवाल होगा, आख़िर ये लोग हैं कौन? जिन्हें ये VIP ट्रीटमेंट दिया जा रहा है?
आप को मालूम होना चाहिए कि नबी करीम ﷺ ने अपने सहाबा को एक ऐसी ख़ुशख़बरी दी थी, जो ईमान वालों के दिल को रोशनी और उम्मीद से भर देती है। हदीस ये है कि हज़रत इबने अब्बास (रज़ि.) से रिवायत है कि
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
“मेरे रब ने मुझे 70 हज़ार अफ़राद के बारे में ख़बर दी है जो मेरी उम्मत में से बग़ैर हिसाब-किताब
के जन्नत में दाख़िल होंगे।”
(सहीह बुख़ारी: 6472 | सहीह मुस्लिम: 220)
उन ख़ुशनसीबों की चार नुमायाँ ख़ूबियाँ
जब सहाबा-ए-किराम (र.अ.) ने बगैर हिसाब किताब के जन्नत में दाख़िले की बात सुनी तो फौरन इन ख़ुशनसीब लोगों की पहचान पूछी, तो नबी करीम ﷺ ने उनकी चार ऐसी ख़ूबियाँ बयान फ़रमाईं जो उन्हें बाक़ी सब लोगों से अलग बनाती हैं:
1. दाग़ लगवाकर इलाज नहीं कराते
यहाँ पर इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि ये लोग इलाज ही नहीं कराते थे, क्यूंकि इस्लाम में बीमारी का इलाज कराना ग़लत नहीं है। लेकिन यहाँ खास तौर पर उस पुराने इलाज की बात हो रही है जिसमें गर्म लोहे से शरीर को दाग़ा जाता था। और यह इलाज बहुत ज़्यादा तकलीफ़देह होता था, इसलिए ये लोग अल्लाह पर अपने मज़बूत भरोसे की वजह से इस तरह के इलाज की तरफ़ नहीं जाते थे।
आसान भाषा में समझें तो इन लोगों की सोच यह थी कि “हम इलाज तो करेंगे, लेकिन हर हाल में हमारा भरोसा अल्लाह ही पर होगा। अगर कोई इलाज बहुत तकलीफ़देह या आख़िरी दर्जे का हो, तो हम अल्लाह की मदद पर ज़्यादा भरोसा करेंगे।”
मान लीजिए किसी को बुखार हो गया और वह डॉक्टर के पास जाकर दवा ले आया, लेकिन उसके दिल में यह नहीं है कि “मुझे सिर्फ़ ये दवा ही ठीक करेगी।” इसलिए वो साथ में अल्लाह से शिफ़ा की दुआ भी कर रहा है। क्यूंकि वह समझता है कि शिफ़ा देने वाला अल्लाह है, दवा तो सिर्फ़ एक ज़रिया है। यही सोच उसे अल्लाह के क़रीब करती है।

2. झाड़फूँक नहीं करवाते
कोई परेशानी आये तो हमें चाहिए कि 2 रकात सलातुल हाजत पढ़ें, और अपना दर्द अल्लाह को सुनाएँ, और ये यक़ीन रखें कि अल्लाह के अलावा कोई ताक़त नहीं है जो आपको फ़ायदा या नुक़सान पहुंचा सके, और मुकम्मल अल्लाह पर तवक्कुल रखें, कि यही वो दर है जहाँ परेशानियाँ दूर हो सकती हैं और आसानियाँ क़रीब आ सकती हैं |
लेकिन हमारा हाल ये है कि अल्लाह के पास जाने के बजाये सीधे किसी पीर या आमिल के पास जाते हैं ताकि वो कोई दम कर दे जिससे मेरे मसअले हल जाएँ, यही वो चीज़ है जो बाक़ी सभी लोगों को इन 70 हज़ार खुशनसीबों से अलग कर देती है |
क्यूंकि ये वो बंदे हैं जिनका दिल पहले ही अल्लाह से जुड़ा होता है, उन्हें न तो किसी आमिल के पास जाना होता है, न किसी पीर के हुजरे में सुकून ढूँढना होता है। उनका दिल कहता है: “मेरे रब को मेरे दर्द का इल्म है, मैं उसी से शिफ़ा माँगता हूँ।” और हक़ीक़त में यही ईमान की आला तरीन सतह है।
इस हदीस का मतलब यह नहीं है कि क़ुरआनी दम (रुक़्या) करना या करवाना हराम है। क्यूंकि नबी करीम ﷺ से क़ुरआनी आयात और मसनून दुआओं के ज़रिये दम करना साबित है और यह बिल्कुल जायज़ भी है। लेकिन इन 70,000 खुशनसीब लोगों की एक ख़ास सिफ़त यह है कि वे दूसरों से जाकर यह नहीं कहते कि “मेरे लिए दम कर दीजिए, मेरे मसअले हल कर दीजिए।” उनका पहला सहारा सिर्फ़ अल्लाह होता है।
मान लीजिए किसी व्यक्ति की नौकरी चली गई। आज अक्सर लोग सबसे पहले किसी पीर, आमिल या तावीज़ देने वाले की तलाश करते हैं। लेकिन यह ख़ुशनसीब बंदा सबसे पहले वुज़ू करता है, नमाज़ पढ़ता है, तहज्जुद में उठता है और अल्लाह से कहता है: “ऐ मेरे रब! रिज़्क़ तेरे हाथ में है, मेरे हाल को तू मुझसे बेहतर जानता है, मेरी मदद फ़रमा।”
वह क़ुरआन की आयातें, सुबह-शाम के अज़कार और मस्नून दुआएँ पढ़ता रहता है। उसका दिल किसी इंसान से नहीं, बल्कि सीधे अपने रब से जुड़ा होता है। यही वह ऊँचा दर्जा है जिसकी वजह से ये लोग बिना हिसाब जन्नत में दाख़िल होने के हक़दार बनते हैं।
3. बदशगूनी से नफ़रत करते हैं
बहुत से लोग छोटी-छोटी बातों को मनहूस समझ लेते हैं, कोई कहता है कि फलाँ दिन अच्छा नहीं है, कोई कहता है कि काली बिल्ली रास्ता काट जाए तो काम बिगड़ जाएगा, कोई किसी नंबर या गिनती या किसी शख्स को मनहूस समझता है। तो जान लीजिये कि इसी को बदशगूनी कहते हैं, और इस्लाम में इन सब की कोई जगह नहीं है।
और इन 70,000 लोगों की पहचान यह है कि वे ऐसी बातों पर यक़ीन नहीं करते, उन्हें पूरा यक़ीन होता है कि नफ़ा और नुक़सान सिर्फ़ अल्लाह के हाथ में है, कोई दिन, तारीख़, जानवर या इंसान अपने आप किसी को फ़ायदा या नुक़सान नहीं पहुँचा सकता।
4. अल्लाह पर मुकम्मल तवक्कुल रखते हैं
यह चौथी और आख़िरी सिफ़त है और ये वो बुनियाद भी है जिस पर बाक़ी तीनों खूबियाँ क़ायम होती हैं। वो सिफ़त और ख़ूबी है ” अल्लाह पर तवक्कुल करना” यह वो कामिल यक़ीन है जो दिल को किसी और तरफ़ झुकने ही नहीं देता। जब ज़िन्दगी के तूफ़ान आएँ, हालात बुरे हों, दुश्मन चारों तरफ़ हों तब भी ये लोग न घबराते हैं न बिखरते हैं।
वो दिल से कहते हैं: “अल्लाह हमें काफ़ी है और वो बेहतरीन कारसाज़ है।”
क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला इर्शाद फ़रमाता है:
“और जो अल्लाह पर भरोसा करे तो वो उसके लिए काफ़ी है।” (65:3)
तवक्कुल का असल मफ़हूम यह है कि” बंदा बज़ाहिर तमाम असबाब इख़्तियार करे, दवा ले، तिजारत करे، तैयारी करे, मगर अन्दर से सिर्फ़ अल्लाह को मुअस्सिर-ए-हक़ीक़ी माने।
यह इन तीनों ख़ूबियों में सबसे बड़ी और सबसे अहम ख़ूबी है “तवक्कुल” इसका मतलब यह नहीं कि इंसान हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाए और कुछ न करे। बल्कि तवक्कुल का मतलब है कि इंसान अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करे, सारे जायज़ ज़रिए अपनाए, लेकिन भरोसा उस ज़रिए पर नहीं सिर्फ़ अल्लाह पर रखे।
आज लोग ज़ाहिरी चीज़ों पर इतना भरोसा करने लगते हैं कि अल्लाह को भूल ही जाते हैं। जबकि मोमिन का हाल यह होता है कि वह मेहनत तो करता है, मगर उसका यक़ीन अल्लाह पर होता है।
मिसाल: एक किसान खेत में बीज बोता है, पानी देता है, खाद डालता है और पूरी मेहनत करता है। लेकिन वह यह नहीं सोचता कि फसल मेरी मेहनत से ही उगेगी। बल्कि उसके दिल में ये होता है कि इसकी मेहनत मैंने कर ली अब यहाँ से अल्लाह का काम शुरू होता है, क्यूंकि वह जानता है कि बारिश, मौसम और फसल का उगना सब अल्लाह के हुक्म से है। इसलिए मेहनत करने के बाद वह अल्लाह से दुआ करता है और उसी पर भरोसा रखता है, और किसी भी तरह की फ़िक्र को करीब नहीं आने देता । यही है तवक्कुल जिसमें असबाब तो अपनाना है, लेकिन दिल को अल्लाह से जोड़े रखना है।
क्या हम भी उनमें से हो सकते हैं?
ये 70 हज़ार ख़ुशनसीब आज भी दुनिया में मौजूद हैं गुमनाम, ख़ामोश, लेकिन अल्लाह के सबसे क़रीब और इनकी पहचान न लिबास से होती है न ओहदे से, बल्कि उनके दिलों में बसने वाले ख़ालिस ईमान, पहाड़ों जैसे मज़बूत तवक्कुल और पाक अक़ीदे से होती है।
अगर आप भी उनमें शामिल होना चाहते हैं तो:
• हर मसले में इंसानी सहारों से पहले अल्लाह की तरफ़ रुजू करें ।
• झाड़फूँक, ताबीज़ और अमलियात जैसे जाहिरी सहारों को छोड़ें |
• बदशगूनी के हर नक़्श को दिल से मिटा दें कोई दिन, कोई रंग, कोई जानवर बुरा नहीं होता और न मनहूस होता है ।
• दवा लें, मेहनत करें, तैयारी करें लेकिन असल भरोसा सिर्फ़ अल्लाह पर रखें।
ऐ अल्लाह! हमें उन 70 हज़ार ख़ुशनसीबों में शामिल फ़रमा जिन पर तूने हिसाब नहीं लिया , आमीन।

