4 Jagah Salam Karna Mana Hai |
4 जगह सलाम करना मना है
4 Jagah Salam Karna Mana Hai : हदीसों में बार-बार यह तालीम दी गई है कि सलाम को आम करो — यहाँ तक कि सहीह बुख़ारी की एक रिवायत में आता है: “हर उस शख़्स को सलाम करो जिसे तुम जानते हो या नहीं जानते।” यानि सलाम सिर्फ एक लफ्ज़ नहीं…ये मोहब्बत है, दुआ है, दिलों को जोड़ने वाला अमल है। सलाम करने वाले के लिए बड़ी-बड़ी नेकियों की खुशखबरी दी गई है, इसलिए हम जहाँ भी किसी से मिलते हैं, फौरन कहते हैं: “अस्सलामु अलैकुम” |
लेकिन…ये भी याद रखना चाहिए कि 4 जगह सलाम करना मना है और यहाँ सलाम से सवाब नहीं मिलता है बल्कि बे अदबी होती है और कुछ जगहं पर तो गुनाह भी हो सकता है। क्यूंकि सलाम का मक़सद होता है मोहब्बत, अदब आपसी ताल्लुक़ लेकिन अगर सलाम से इबादत टूट जाए, इल्म का सिलसिला कट जाए, लोगों की तवज्जो बंट जाए, तो वहाँ सलाम करना अदब नहीं, बे-अदबी बन जाता है। आज इसी अहम मसले को हम बहुत आसानी से समझेंगे, तो चलिए शुरू करते हैं |
4 Jagah Salam Karna Mana Hai
1. जब कोई क़ुरआन की तिलावत कर रहा हो
अगर कोई शख़्स क़ुरआन की तिलावत में मशगूल हो और आप उसके पास जाकर कहें: “अस्सलामु अलैकुम” तो ये तरीका दुरुस्त नहीं। क्यों? क्योंकि वो अल्लाह के कलाम से हमकलाम है, उसकी तवज्जो अल्लाह की तरफ़ है, सलाम उसे उस तवज्जो से हटाता है, अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:
“और जब क़ुरआन पढ़ा जाए तो उसे ध्यान से सुनो और ख़ामोश रहो।”
(सूरह अल-आराफ़: 204)
जब सुनना और ख़ामोशी इतनी अहम है, तो बीच में सलाम करना कैसे दुरुस्त हो सकता है?
2. तस्बीहात, दुरूद और वज़ाइफ़ के दौरान
बहुत लोग ये सोचते हैं: “ये तो तस्बीह ही पढ़ रहे हैं, सलाम में क्या हर्ज़ है?” यहीं पर ग़लतफ़हमी होती है। क्यूंकि:
- ज़िक्र-ए-इलाही भी इबादत है
- दुरूद शरीफ़ भी इबादत है
- वज़ाइफ़ भी इबादत है
और इबादत के दौरान सलाम करना मना है। क्योंकि सलाम का जवाब देना पड़ता है, और जवाब देने से ज़िक्र टूट जाता है

3. दर्स, तक़रीर और इल्मी मजलिस के दौरान
ये आज का सबसे ज़्यादा बिगड़ा हुआ अदब है। दर्स चल रहा है, हदीस बयान हो रही है, कोई अहम शरई मसला समझाया जा रहा है, और कोई अंदर आकर ज़ोर से कहता है: “अस्सलामु अलैकुम” नतीजा क्या होता है? पूरी मजलिस सलाम की तरफ़ देखती है, तवज्जो टूट जाती है, दर्स का मोमेंटम खत्म हो जाता है और दर्स देने वाला जिस flow में बात कर रहा था वो flow टूट जाता है |
इसलिए मुदर्रिस को सलाम करना या सुनने वालों को सलाम करना बिलकुल भी मुनासिब नहीं है ये अमल मकरूह है, बल्कि ये मजलिस के अदब के ख़िलाफ़ है तो इसलिए बेहतर ये है कि ख़ामोशी से आएँ, बैठें, और सुनना शुरू करें।
4. अज़ान, इक़ामत और ख़ुतबे के वक़्त
ये जगह ऐसी हैं जहाँ बात करना, किसी दुसरे की तरफ़ मुतवज्जह होना और ख़ुत्बे की तरफ़ तवज्जो न होना सबसे सख्ती से मना किया गया है, और वो जगह हैं
- इक़ामत के वक़्त
- जुमे का ख़ुतबा
- ईदैन का ख़ुतबा
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“जब इमाम ख़ुतबा दे रहा हो और तुमने अपने साथी से भी कहा ‘चुप रहो’, तो तुमने भी ग़लती की।”
(सहीह बुख़ारी, हदीस: 934 और सहीह मुस्लिम, हदीस: 851)
तो जब “चुप रहो” कहना भी मना है, तो सलाम करना कैसे जायज़ होगा?
अगर किसी ने इन जगहों पर सलाम कर दिया?
अगर किसी ने तिलावत ज़िक्र और दर्स के दौरान सलाम कर दिया…तो सामने वाले को इख़्तियार है जवाब दे या न दे, मतलब यहाँ पर जवाब देना वाजिब और ज़रूरी नहीं। ख़ुतबे के वक़्त जवाब देना हर हाल में मना है, क्योंकि जवाब देना भी एक तरह से बोलना है और ख़ुत्बे से तवज्जो हटाना है |
तो अगर कोई जवाब न दे तो आप के दिल में ये ख्याल में ये बात नहीं आणि चाहिए कि “ये तो बड़े घमंडी हैं” “सलाम का जवाब नहीं दिया” याद रखिए जिसने जवाब नहीं दिया, उसने कोई गुनाह नहीं किया। बल्कि ख़ुत्बे के अदब का ख्याल रखा |
नतीजा
सलाम इस्लाम की रूह है, लेकिन अदब के साथ। जहाँ इबादत चल रही हो इल्म चल रहा हो, ख़ुतबा चल रहा हो, वहाँ ख़ामोशी सबसे बड़ा सलाम है। अगर कभी जवाब न मिले दिल साफ़ रखें बदगुमानी न करें |

