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अस्हाबु फील (हाथियों वाले ) का वाकिया

सीरतुन नबी Part 2

अस्हाबु फील का मतलब “हाथियों वाले” ये इनको इसलिए कहा जाता है कि अबरहा का लश्कर खाने काबा को गिराने हाथियों के साथ आया था

 

नबी की पैदाइश मुबारक से पचास या पचपन दिन पहले

ये वाकिया हमारे नबी मुहम्मद सल्लल लाहू अलैहि वसल्लम की पैदाइश मुबारक से पचास या पचपन दिन पहले का है जो सीरत की किताबों में बहुत मशहूर है और कुराने करीम में इस के बारे में एक ख़ास सूरत नाजिल हुई वो ये है

वाकिया कुछ इस तरह है कि यमन का हाकिम जिसका नाम अब्रह था जब उसने देखा कि तमाम अरब के लोग काबे के हज के लिए मक्का मुकर्रमा जाते हैं और खाने काबा का तवाफ़ करते हैं तो उसने चाहा कि इसाई मज़हब के नाम पर ऐसी आलीशान इमारत बनाऊ जो इन्तिहाई खूबसूरत हो ताकि अरब के लोग इस सादे से काबे को छोड़ कर इस आलीशान खूबसूरत इमारत का तवाफ़ करें इसलिए उसने यमन की राजधानी सनआ में एक बहुत खूबसूरत गिरजाघर बनवाया

अरब में जब ये खबर मशहूर हुई तो कबीला कनाना का कोई आदमी वहां आया और पखाना करके भाग गया और कुछ ये भी कहते हैं कि अरब के नौजवानों ने उस के करीब आग जलाई हुई थी हवा से उड़ कर कोई चिंगारी उस में भी जा पहुंची जिस से गिरजा जल कर ख़ाक हो गया

 

अब्रहा का काबे को गिराने के लिए आना 

अब्रहा ने गुस्से में आकर क़सम खाई कि खाने काबा को गिरा कर दम लूँगा इसी इरादे से मक्का की तरफ फ़ौज लेकर गया रस्ते में जिस कबीले ने उसको रोकने की कोशिश की उसको ख़त्म करते हुए आगे बढ़ता रहा यहां तक कि मक्का मुकर्रमा जा पहुंचा

लश्कर और हाथी भी साथ थे  मक्का के चारो तरफ जो मक्का वालों के जानवर चरते थे सब को उसके लश्कर ने पकड़ लिए जिनमें दो सौ ऊँट नबी मुहम्मद सल्लल लाहू अलैहि वसल्लम के दादा अब्दुल मुत्तलिब के थे उस वक़्त अब्दुल मुत्तलिब काबा के ज़िम्मेदार और कुरैश कबीले के सरदार थे

 

अब्दुल मुत्तलिब और अब्रहा की मुलाक़ात 

जब उनको अब्रह के लश्कर की खबर हुई तो उन्होंने मक्का वालों को जमा करके कहा घबराओ नहीं मक्का खली कर दो खाने काबा को कोई गिरा नहीं सकता ये अल्लाह का घर है वो खुद उसकी हिफाज़त करेगा इस के बाद अब्दुल मुत्तलिब कुरैश के कुछ आदमियों को लेकर अब्रहा से मिलने गए तो अब्रहा ने अब्दुल मुत्तलिब का शानदार इस्तिक्बाल किया

अल्लाह ने अब्दुल मुत्तलिब को हुस्नो जमाल और रोबो दबदबा अता फ़रमाया जिस को देख कर हर शख्स उनके रौब में आ जाता था अब्रहा भी अब्दुल मुत्तलिब को देख कर मरऊब हो गया और बहुत इह्तिराम से पेश आया

उसने ये तो मुनासिब न समझा कि किसी को अपने तख़्त पर अपने बराबर बिठाये लेकिन ये ज़रूर किया कि तख़्त से नीचे उतर कर फर्श पर अब्दुल मुत्तलिब को साथ बिठाया

बातचीत के दौरान अब्दुल मुत्तलिब ने उन ऊंटों को आज़ाद करने को कहा तो अब्रहा ने तअज्जुब से कहा कि बड़े तअज्जुब की बात है कि तुमने अपने ऊंटों के बारे में बात की लेकिन काबा जो तुम्हारा और तुम्हारे बाप दादा का दीन है उसके बारे में कोई बात नहीं की

अब्दुल मुत्तलिब ने कहा कि मैं ऊंटों का मालिक हूँ और काबे का मालिक खुदा है वो खुद इस घर को गिरने से बचाएगा अब्रहा ने थोड़ी देर ख़ामोशी के बाद सारे ऊँट वापस कर दिए

अब्दुल मुत्तलिब अपने ऊँट वापस लेकर आये और कुरैश को हुक्म दिया कि मक्का खली कर दें और कुछ आदमियों को लेकर खाने काबा के दरवाज़े पर गिडगिडा कर दुआ मांगने लगे

 

अबाबील परिंदों का अब्रहा के लश्कर को तबाह करना 

अब्दुल मुत्तलिब दुआ से फारिग होकर अपने साथियों और लोंगों के साथ पहाड़ पर चढ़ गए और अब्रहा अपना लश्कर लेकर काबा को गिराने के लिए आगे बढ़ा

अचानक खुदा के हुक्म से छोटे छोटे परिंदों के झुण्ड नज़र आने लगे हर एक की चोंच और पंजों में छोटी छोटी कंकरियां थीं जो अचानक लश्कर और फ़ौज पर बरसने लगीं खुदा की कुदरत से वो कंकरियां गोली का काम दे रही थीं वो सर पर गिरती थीं और जिस्म को चीरती हुई नीचे निकल जाती थीं और जिस पर गिरती थीं वो ख़त्म हो जाता था

इसी तरह अब्रहा का पूरा लश्कर तबाह और बर्बाद हुआ और अब्रह के बदन पर चेचक के दाने निकल आये उसका पूरा बदन सड़ गया बदन से खून और पीप बहने लगा एक के बाद एक उसके जिस्म का हिस्सा कट कट कर गिरता जाता था आखिर कार उसका सीना फट पड़ा और दिल बाहर निकल आया और उसका खत्मा हो गया

जब सभी मर गए तो अल्लाह ने एक सैलाब भेजा जो सभी को बहा कर दरिया में ले गया

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