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Lailatul Qadr Special | 10 टिप्स : लैलतुल क़द्र और आखिरी अशरे की बरकतें कैसे पाएं?

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Lailatul Qadr Special |

10 टिप्स : लैलतुल क़द्र और आखिरी अशरे की बरकतें कैसे पाएं?

रमज़ान (Ramzan) का आखिरी अशरा (आख़िरी दस दिन) हर बन्दे के लिए इबादत का और मगफिरत हासिल करने का है, और इस अशरे की आख़िरी रातों में लैलतुल क़द्र (Lailatul Qadr) यानि शबे क़द्र (Shabe Qadr) जैसी मुबारक रात छिपी हुई है और लैलतुल क़द्र तो आप जानते ही होंगे कि सूरह क़द्र  के अन्दर क़ुरान में फ़रमाया गया है कि लैलतुल क़द्र हज़ार महीनों की इबादत से बेहतर है (सूरह अल-क़द्र 97:3)

और चूंकि ये रमज़ान के आख़िरी दिन हैं और इसके बाद रमज़ान 11 महीने बाद आयेगा और पता नहीं मिले कि ना मिले इसलिए इस मौक़े को ग़नीमत समझिये और फ़ायदा उठाइए लेकिन सवाल ये है कि कैसे हम इन दस दिनों को गुजारें कि इस अशरे की बरकत हमें भी हासिल हो जाये तो यहाँ पर हम Lailatul Qadr Special पोस्ट डाल रहे हैं जिसमे इन दस दिनों और रातों को बेहतरीन बनाने के लिए 10 टिप्स दी गयी है चलिए इन को तफ़सील से समझते हैं:

1. गुनाहों से बचें 

इबादत की तामीर के लिए जरूरी है कि गुनाहों से बचा जाए, क्यूंकि दिन के वक्त गुनाह करने से रात की इबादत का असर खत्म हो सकता है, इसलिए अगर गुनाहों का बोझ लेकर इन रातों में दाखिल होंगे तो वो रूहानियत हासिल नहीं होगी जिससे हमारे अन्दर की दुनिया बेहतर हो जाये इसलिए गुनाहों से बचना और तौबा करना जरूरी है।

2. एक खास दुआ बार-बार करें 

हज़रत आयशा (र.अ.) ने नबी ﷺ से पूछा कि अगर शबे क़द्र मिल जाए तो क्या दुआ करें? तो रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:

اللَّهُمَّ إِنَّكَ عَفُوٌّ تُحِبُّ الْعَفْوَ فَاعْفُ عَنِّي

Hindi : अल्लाहुम्मा इन्नका अफुव्वुन तुहिब्बुल अफ़वा फ़’अफु  अन्नी

“ऐ अल्लाह! तू माफ करने वाला है, माफ करने को पसंद करता है, मुझे माफ फरमा।”

नोट : ये दुआ रमज़ान के आख़िरी दस दिनों के लिए ख़ास है इसलिए इसको बार-बार पढ़ें।

3. ईशा और फज्र की नमाज़ जमाअत से पढ़ें 

हदीस में आता है: “जिसने ईशा और फज्र की नमाज़ जमाअत से पढ़ी, उसे पूरी रात की इबादत का सवाब मिलेगा।” (मुस्लिम: 656) इसलिए अगर पूरी रात जागना मुमकिन न हो, तो भी ईशा और फज्र की जमाअत से नमाज़ ज़रूर अदा करें यह अमल आपको पूरी रात की इबादत का सवाब देगा।

4. तरावीह (Taraweeh) ना छोड़ें

ये नमाज़ सिर्फ़ रमज़ान के लिए ख़ास है अगर पूरे साल या साल में कभी इसको पढ़ कर इसका सवाब लेना चाहें तो ये मुमकिन नहीं है इसलिए तरावीह से खुद को महरूम न करें। अगर अल्लाह ने आपको खाने पीने और चलने फिरने की ताक़त दी है तो इस ताक़त को उसकी इबादत में ख़र्च करें न कि बेफ़ायदा चीज़ों में |

5. कुरआन की तिलावत बढ़ा दें 

रसूलुल्लाह ﷺ रमज़ान के आखिरी 10 दिनों में कुरआन की तिलावत बढ़ा देते थे, इमाम शाफई (رحمه الله) आखिरी 10 रातों में हर रात एक मुकम्मल कुरआन खत्म करते थे, और जितने भी अल्लाह के नेक बन्दे थे सब का रमज़ान में यही रूटीन था कि दूसरी मसरूफियात कम करके कुरआन की तिलावत को अव्वल रखते थे इसलिए अगर आप चाहते हैं कि नेक बन्दों में शामिल हों तो कुरआन को मोहब्बत से और तवज्जो के साथ पढ़ें।

6. फुज़ूल बातों और सोशलाइज़िंग से बचें 

इन रातों का मकसद अल्लाह से रिश्ता मजबूत करना है, गैर-ज़रूरी गुफ्तगू, गॉसिप और सोशल मीडिया से दूर रहें,  ज्यादा से ज्यादा तन्हाई में अल्लाह से रिश्ता जोड़ने की कोशिश करें और इस वक्त को बर्बाद करने के बजाय इबादत और तस्बीह में लगाएं।

7. हर हाल में दुआ करते रहें 

चलते-फिरते, बैठते, काम करते हुए दुआ करते रहें क्यूंकि आप नहीं जानते कि किस वक्त आपकी दुआ कबूल हो जाए। दुआ में अपने गुनाहों की माफी, रहमत और हिदायत मांगे और जुबान को हमेशा अल्लाह की याद से तर रखें।

8. सज्दा लंबा करें 

रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया: “बंदा अपने रब के सबसे करीब सज्दे की हालत में होता है। (मुस्लिम: 482) इसलिए दिल से लम्बा सज्दा करें और सज्दे में अल्लाह से रो-रो कर दुआ करें। सज्दे में अपनी कमजोरियां, परेशानियां और ज़रूरतें अल्लाह के सामने रखें।

9. सदक़ा (Charity) जरूर दें

रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया: “सदक़ा अल्लाह के गुस्से को ठंडा कर देता है।”(तिर्मिज़ी: 664) इसलिए छुपकर सदक़ा दें, भले ही थोड़ा ही क्यों न हो, अब चूंकि रमज़ान में हर चीज़ का सवाब कई गुना बढ़कर मिलता है तो सदके का सवाब भी बढ़कर मिलता है इसलिए इस सवाब से खुद को महरूम न करें।

10. आखिरी लम्हों को ग़नीमत समझें 

सहरी के वक्त के आखिरी लम्हों में अल्लाह की रहमत नाज़िल होती है। अल्लाह पुकारते हैं:”है कोई जो मुझसे माफी मांगे, ताकि मैं उसे माफ कर दूं?” बस इन आखिरी लम्हों में रो कर दुआ करें कि अल्लाह आपको जहन्नम से निजात दे और जन्नत में दाखिल फरमाए। यह मौका हाथ से न जाने दें।

“या अल्लाह! हमें इन मुबारक रातों की बरकतों से मालामाल फरमा। हमारी तौबा को कबूल फरमा, हमारी इबादतों को शबे क़द्र की इबादत बना दे और हमें जन्नत का हक़दार बना। आमीन!”

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