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Depression Ka Ilaj Quran Se | 10 क़ुरआनी सूरह डिप्रेशन से लड़ने के लिए

depression ka ilaj quran se

Depression Ka Ilaj Quran Se

10 क़ुरआनी सूरह डिप्रेशन से लड़ने के लिए

अभी कुछ ही दिनों पहले की बात है, आप बहुत ख़ुश थे, आगे बढ़ने की ख्वाहिश थी कुछ कर गुज़रने की तमन्ना अंगड़ाईयाँ ले रही थीं, ज़िन्दगी में बड़ी उमंगें थीं लेकिन फ़िर एक हाद्सा ऐसा पेश आ गया कि सारी तमन्नाओं का महल टूट्ता नज़र आया, सारी ख़्वाहिशें दम तोड़ती नज़र आयीं

और ये सब जब आपके साथ हुआ तो आप मायूसी के दलदल में फंसते चले गए यहां तक कि आप डिप्रेशन का शिकार हो गए और इस डिप्रेशन ने आपको वहां ले जा कर छोड़ा कि आप कुछ आगे क़दम बढ़ाना तो छोड़ो आपको इस दुनिया में  जीने की तमन्ना ही न रही और तरह तरह के Negative ख़याल दिल में आने लगे |

Islam About Depression

लेकिन Depress लोगों के बारे में इस्लाम कहता है कि हर तन्गी और मुश्किल के बाद आसानी है, और ये ज़िन्दगी जंग का मैदान है कभी हार होगी तो कभी जीत, और सारी ज़िन्दगी फूलों की सेज पर ही नहीं गुज़रती बल्कि काँटों पर से भी गुज़रना पड़ सकता है और यही हक़ीक़त है इस दुनिया की

इसलिए इस्लाम में मायूसी कुफ़्र है एक मोमिन बंदा किसी भी मुश्किल के सामने डट कर खड़ा हो जाता है और उस मुश्किल को अल्लाह की आज़माइश समझ कर सब्र करता है और यक़ीन रखता है कि अल्लाह तआला उसके लिए रस्ते ज़रूर खोलेंगे फ़िर इस यक़ीन का रिज़ल्ट एक दिन तरक्क़ी और कामयाबी की सूरत में आता है

अल्लाह के पैग़म्बर जब भी लोगों को अल्लाह की तरफ़ बुलाते थे, तो लोग उनकी बात मानने के बजाये उन्हें तकलीफ़ें देते थे और पैगम्बरों का दिल लोगों के लिए रोता और परेशान रहता था और ये परेशानी उस से कहीं ज़्यादा थी जितनी एक माँ अपनी औलाद के लिए करती है

इसलिए अल्लाह ने क़ुरआन में ऐसी सूरह नाज़िल कीं जिससे उनके हौसले और बढे और अपने काम में पूरे यक़ीन के साथ जम गए, इन सूरह में लोगों की हिदायत के साथ साथ उनके दिली सुकून का सामान भी अल्लाह ने अता फ़रमाया है यानि Depression Ka Ilaj Quran Se

Depression Ka Ilaj Quran Se

10 सूरह डिप्रेशन से लड़ने के लिए

सूरह दुहा ( Surah No.93)

अल्लाह तआला ने सूरह दुहा (Surah Duha) को उस वक़्त नाज़िल किया जब हमारे पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बहुत उदास थे, तो इस सूरह ने उनके दिल को सुकून से भर दिया, ये याद रहे हमारे नबी ऐसे शख्स हैं जिन्होंने इस दुनिया में सबसे ज्यादा तकलीफ़ें और दुख झेले हैं,

इस सूरह में अल्लाह तआला ने अपने पैगंबर को वो नेअमतें याद दिलाई हैं जो अल्लाह ने उनके लिए खोल रखी थीं | और फ़रमाया कि आख़िरत का साज़ो सामान दुनिया के सामान से बहुत बेहतर है, और गरीबों व जरूरतमंदों की मदद करने का भी हुक्म दिया है।

सूरह इन्शिराह (Surah No.94)

सूरह दुहा के साथ, अल्लाह ने सूरह इंशिराह ( Surah Inshirah ) को भी नाज़िल किया, इस में अल्लाह ने नबी करीम (सल्लल लाहू अलैहि वसल्लम) से फ़रमाया है कि “हम ने आपके सीने से उस दर्द और बोझ को कम कर दिया जो आप कुरान नाज़िल होते वक़्त महसूस करते थे ।
अल्लाह तआला ये भी फ़रमाते हैं कि हम ने आपके ज़िक्र को दुनिया भर में ख़ूब फैलाया, और आज हम देख सकते हैं कि इस पूरी कायनात पर कहीं न कहीं अज़ान हो रही होती है तो अज़ान देने वाला कह रहा होता है “अशहदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह” ( यानि मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद स.स. अल्लाह के रसूल हैं)

इस सूरह में अल्लाह ने यह भी याद दिलाया है कि कठिनाई से पहले और कठिनाई के बाद दोनों में आसानी होती है। फिर नबी को हुक्म मिला कि वह जब लोगों को अल्लाह की तरफ़ बुलाने का फ़र्ज़ पूरा करलें तो अपने रब की इबादत में लग जाएँ ताकि अल्लाह का और बन्दों का दोनों का हक़ अदा हो ।

सूरह युसुफ ( Surah No.12 )

नबी करीम (सल्लल लाहू अलैहि वसल्लम) पर नाज़िल होने वाली शुरुआती सूरतों में सूरह यूसुफ ( Surah Yusuf ) भी है । इस सूरह का अक्सर हिस्सा में सिर्फ अल्लाह के एक पैगंबर हज़रत यूसुफ (अलैहिस सलाम) की कहानी ज़िक्र की गयी है।

इस सूरह से अनगिनत सबक हासिल किए जा सकते हैं कि बचपन में एक वक़्त ऐसा था जब हज़रत यूसुफ (अलैहिस सलाम) के भाईयों ने जलन की वजह से उन्हें कुवें में डाल दिया था लेकिन एक वक़्त ऐसा भी आया कि वो मिस्र के बादशाह बने

और इस कुएं से महल तक का सफ़र करने में जो मुश्किलें आई और दर्द और पीड़ा से कैसे निपटे और कैसे अल्लाह ने उनके इस सब्र की वजह से उनको ऊपर उठाया। इस सूरह भी डिप्रेशन का बेहतरीन इलाज है !

सूरह रहमान (Surah No.55)

सूरह रहमान ( Surah Rahman ) एक खुली साफ़ तस्वीर है जिसमें इन्सान जन्नत और जहन्नम दोनों का मंज़र देख सकता है । और उन नेअमतों को भी देख सकता है जो अल्लाह ने हमें अता की हैं

यह एक ऐसी सूरह है कि जब हम इसे सुनते हैं तो कानों को सुकून बख्शती है, दिल को इतमिनान दिलाती है, और रूह को खाना देती है। इसमें जन्नत के ख़ूबसूरत मंज़र दिखाए गए हैं और वहां की चीज़ों और वहां के रहने वालों का ज़िक्र किया गया है

और अल्लाह ने उन नेअमतों को याद दिलाया है जो उसने हमें अता की हैं जिस से हम क्या खो गया उस पर नहीं क्या हासिल हुआ उस पर फ़ोकस करते हैं जिससे हमारा Depression काफ़ी हद तक निकल सकता है

सूरह नास (Surah No.114)

Depression इंसान को तब होता है जब वो ख़ुद पर भरोसा ना करने के बजाये शक करता है । मायूसी और बुरे ख्यालात, Negative Thoughts उसमें चलते हैं और अक्सर ये बातें शैतान के वस्वसों की वजह से पैदा हो जाती हैं, वो शैतान जिसने ज़मीन पर हर शख्स को गुमराह करने की क़सम खायी है जो वह कर सकता है।

लेकिन, अल्लाह तआला अपने बन्दों पर बहुत महरबान हैं और इसीलिए उस ने शैतान के वस्वसों मुकाबला करने के लिए सूरह नास (Surah Naas ) नाज़िल की है। इसे पढ़ने रहने से वस्वसों को दूर करने में मदद मिलती है और यह एक ऐसी सूरह है जो अल्लाह की हिफ़ाज़त में पहुंचा देती है।

सूरह इसरा, कहफ, मरियम, ताहा, अंबिया ( Surah No.17, 18, 19, 20, 21)

नबी करीम (सल्लल लाहू अलैहि वसल्लम) के मशहूर सहाबी हज़रत अब्दुल्ला इब्न मसउद (रज़ियल लाहू अन्हु) ने इन सूरह (सूरह Isra, Kahaf, Mariyam, Taha, Ambiya) के बारे में कहा, “ये नाज़िल होने वाली पहली सूरतों में से थीं और ये मेरे लिये एक ख़ज़ाने की तरह हैं ।”
इमाम अल-बैहक़ी ने इस बयान को इस तरह समझाया है कि “वह इन सूरहों की फ़ज़ीलत और Superiority का जिक्र कर रहे थे क्योंकि इस सूरतों में पिछले नबियों और उनकी कौमों की कहानियां शामिल हैं।

और वो इस्लाम की शुरुआत में नाज़िल होने वाली सूरतों में से थीं, और ये मक्का में उस वक़्त नाज़िल हुईं जब नबी करीम स.अ. काफ़िरों की तरफ़ से दी गयी मुश्किलों को झेल रहे थे और सब्र कर रहे थे । इन सभी सूरहों में नबियों की, पुरानी क़ौमों की, और ख़ास कर बनी इसराइल की बहुत सारी कहानियाँ हैं।

और इन कहानियों में एक depress शख्स के लिए उम्मीद दिलाने और ज़िन्दगी की राहों में आने वाली मुश्किलात से से हँसते खेलते गुज़र जाने का सामान मौजूद है और हमें इस बात का अहसास होता है कि आख़िर कितनी भी बड़ी मुश्किलें क्यूँ ना हमारे सामने हों हम अगर ख़ुद पर और खुदा पर यक़ीन रखते हैं तो जीत हमारी ही होती है

अल्लाह बीमारियों से हम सब की हिफ़ाज़त फ़रमाए 

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