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Kya Farishte Aapke Ghar Aate Hain? क्या फ़रिश्ते आपके घर आते हैं?

Kya Farishte Aapke Ghar Aate Hain?

Kya Farishte Aapke Ghar Aate Hain?

क्या फ़रिश्ते आपके घर आते हैं?

7 निशानियाँ

Kya Farishte Aapke Ghar Aate Hain? : कभी आपने महसूस किया है…कुछ घरों में दाख़िल होते ही दिल को सुकून मिल जाता है… कुछ न होते हुए भी वहां के रहने वालों में बरकत होती है उनकी रोज़ी और रिज्क में बरकत होती है, और उनके घर का माहौल औरों से अलग होता है और कुछ जगहें ऐसी होती हैं जहाँ सब कुछ होता है लेकिन बिना वजह बेचैनी होने लगती है? माहौल खिंचा खिंचा सा रहता है, क्यूंकि रहमत और बरकत वहां से रूठ जाती है |

अब सवाल ये उठता है कि ऐसा क्यूँ होता है कि कुछ लोग रहमत और बरकत से महरूम रह जाते हैं, जिसका नतीजा ये होता है कि कहीं औलाद नहीं है, और अगर है तो उसकी तरफ़ से सुकून नहीं है, कहीं दौलत नहीं है और अगर है तो उसकी वजह से सुकून नहीं है, इसके अलावा ज़िन्दगी से जुडी कई ऐसी बातें जो इन्सान को पुर सुकून रहने के लिए ज़रूरी होती हैं वो नहीं है |

ऐसा तब होता है जब हमारी गलतियों की वजह से रहमत और बरकत के फ़रिश्ते हमारे घर में नहीं आते तो हम महरूम रह जाते हैं लेकिन जिनके घर में फ़रिश्तों का आना जाना लगा रहता है उनकी ज़िन्दगी में रौनक़ रहती है |

तो चलिए, जानें उन घरों की पहचान क्या है, जहाँ फ़रिश्ते आते हैं ताकि हम भी उन पर अमल करें और रहमत और बरकत हमारे आँगन में भी नाजिल हो |

1. जहाँ क़ुरआन पढ़ा जाता है

नबी करीम ﷺ ने फरमाया:

 

“अपने घरों को कब्रिस्तान मत बनाओ। जिस घर में सूरह बक़रह पढ़ी जाती है, वहाँ शैतान नहीं आता।”

 

 (Sahih Muslim)

इस हदीस का मतलब साफ़ है कि जहाँ क़ुरआन की तिलावत होती है, वहाँ रहमत उतरती है और शैतानी असर दूर होता है। इमाम नववी (रहमतुल्लाह अलैह) ने इस हदीस की तशरीह करते हुए लिखते हैं  कि घर में क़ुरआन की आवाज़ न होना उसे “रूहानी क़ब्रिस्तान” बना देता है यानि ऐसा घर जहाँ न नूर हो, न हरकत, न ज़िंदगी।

इसका सीधा मतलब है कि हर रोज़ थोड़ा क़ुरआन ज़रूर पढ़ें और बच्चों को पढ़ना सिखाएं, ये सब घर को रूहानी तौर पर ज़िंदा बना देते हैं।

2. जिस घर में नमाज़ कायम होती है

नबी करीम ﷺ ने सहाबा किराम को नवाफ़िल घर में पढ़ने की खास तरग़ीब दी। और

बताया कि आदमी की सबसे अफ़ज़ल नमाज़ उसके घर में है, सिवाय फ़र्ज़ नमाज़ के।

 सहीह बुखारी, हदीस 731 · सहीह मुस्लिम, हदीस 781

शैखुल-इस्लाम इबने तैमियह (रहमतुल्लाह अलैह) फ़रमाते हैं कि घर में नमाज़ का एहतमाम करने से घर भी “मस्जिद का हिस्सा” बन जाता है, यानि रहमत और फ़रिश्तों की आमद की जगह बन जाता है । तो तहज्जुद, वित्र, इशराक़ और इसके अलावा फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद की नफ्ल रकातें अगर घर में पढ़ी जाएँ तो इससे घर में रूहानी फ़िज़ा आती है ।

और ये बात हमेशा याद रखें कि नमाज़ सिर्फ एक फ़र्ज़ अमल और सिर्फ एक डयूटी नहीं है कि बस कर लिया बल्कि यह रूहानी connection है, जिससे बंदा ज़मीन पर बैठे हुए भी अर्श तक पहुँच जाता है यानि अल्लाह से connect होता है |

और हमारे नबी करीम ﷺ ने बताया कि नमाज़ के वक़्त फ़रिश्ते मौजूद होते हैं और नमाज़ी की दुआ पर “आमीन” कहते हैं। यानि आप जब घर में नमाज़ पढ़ते हैं तो फ़रिश्ते आपकी दुआ पर आमीन कहते हैं इसका मतलब है कि उसवक्त फ़रिश्ते आपके घर में मौजूद होते हैं |

Kya Farishte Aapke Ghar Aate Hain?

3. जब आप दूसरों के लिए दुआ करते हैं

जब कोई मुसलमान अपने भाई के लिए पीठ पीछे (उसकी ग़ैर-मौजूदगी में) दुआ करता है तो फ़रिश्ता कहता है: आमीन,

और तुम्हें भी ऐसा ही मिले।

सहीह मुस्लिम, किताब अल-ज़िक्र वल-दुआ, हदीस 2732

ज़रा सोचिए: आप अपने घर में अकेले बैठे किसी के लिए दुआ कर रहे हैं, और एक फ़रिश्ता आपके पास आप आप घर में अकेले हैं, अचानक किसी की कोई बात याद आई या कोई शख्स याद आ गया जिसके लिए आपके दिल से दुआ निकली तो याद रखना ये दुआ कोई मामूली दुआ नहीं, क्यूंकि इस दुआ पर आमीन कहने के लिए फ़रिश्ते आसमान से उतर आते हैं |

इमाम जौज़ि (रहमतुल्लाह अलैह) लिखते हैं कि दुआ सिर्फ एक इबादत ही नहीं है बल्कि यह वह मकनातीस (चुम्बक) है जो रहमते इलाही को खींचता है, और फ़रिश्तों की मौजूदगी का सबब बनता है। तो जब आप अपने घर से किसी के लिए दुआ करते हैं तो याद रखना उस वक़्त घर में फ़रिश्तों का जमावड़ा मौजूद है, जो आपकी दुआ पर “आमीन” कह रहा है।

4. जब गुनाह करना मुश्किल लगने लगे

यह बहुत ही बारीक और गहरा इशारा है कि पहले जो गुनाह आसान लगता था…अब वही करने से पहले दिल घबराने लगता है। या अब उसकी तरफ़ दिल माइल नहीं होता और उसकी तरफ़ से बे परवाई होने लगी है

तो यह सिगनल है कि  आपको हिदायत और रूहानी protection दिया जा रहा है, वो अलग बात है कि लोग इसको सिर्फ “maturity” का नाम देते हैं, हालाँकि किसी गुनाह से रुक जाना और भलाई की तरफ़ दिल माइल होना यूँही नहीं होता ये अल्लाह की तरफ़ से भेजे गए फ़रिश्तों की वजह से होता है जो शैतान से protect कर रहे होते हैं

फ़रिश्ते भलाई की तरफ़ बुलाते हैं और शैतान बुराई की तरफ़, जब दिल खुद रुकने लगे समझो अल्लाह आपको बचा रहा है, तो अगर आप किसी गुनाह के क़रीब जाते वक़्त अंदर से कुछ रुकावट महसूस करें तो समझ जाइये कि अल्लाह आपको बचा रहा है।

5. जब आप बुरी चीज़ें हटाने लगते हैं

नबी ﷺ ने फरमाया:

 

“जिस घर में कुत्ता या तस्वीर (जानदार की) हो, उसमें फ़रिश्ते दाख़िल नहीं होते।”

 

 (Sahih Bukhari)

इससे एक principle समझ आता है कि जो चीज़ अल्लाह को नापसंद है उससे रहमत दूर हो जाती है, तो जब आप, गुनाह वाली चीज़ हटाते हैं, हराम कंटेंट छोड़ते हैं, तो बदले में मिलता है, सुकून + साफ दिल क्यूंकि जहाँ अल्लाह की नापसंद चीज़ें नहीं होती हैं वहां पर अल्लाह की रहमत और फ़रिश्तों का बसेरा होता है |

उलमा ने इस हदीस से एक उसूल निकाला है: जो चीज़ अल्लाह को नापसंद हो, वह रहमत को दूर करती है, और अल्लाह को नाराज़ करने वाली चीज़ें में शामिल हैं हर तरह का हराम मवाद, फ़ुहश तस्वीरें और वह चीजें जो अल्लाह से ग़ाफ़िल कर दे। जब आप इन चीज़ों को हटाते हैं तो बदले में मिलता है सुकून, साफ़ दिल और रूहानी वज़ाहत।

6. जब आपको अनदेखी हिफाज़त मिलती है

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ कि “अचानक कोई हादसा टल गया” “गलत फैसला लेने से बच गए” “गुस्से में कुछ कहने वाले थे, पर रुक गए” तो क्या ये यूँहीं हो गया बिल्कुल भी नहीं और ये “luck” भी नहीं है …बल्कि अल्लाह की तरफ़ से भेजी गई हिफाज़त होती है। इसके बारे में क़ुरआन में अल्लाह फरमाता है:

لَهُ مُعَقِّبَاتٌ مِّن بَيْنِ يَدَيْهِ وَمِنْ خَلْفِهِ يَحْفَظُونَهُ مِنْ أَمْرِ اللَّهِ

 

 “उसके लिए आगे और पीछे फ़रिश्ते हैं, जो अल्लाह के हुक्म से उसकी हिफाज़त करते हैं।”

 

(Qur’an) — सूरह अर-रअद: 11

इमाम तबरी (रहमतुल्लाह अलैह) ने इस आयत की तफ़सीर में लिखा है कि ये फ़रिश्ते बंदे के साथ हर वक़्त रहते हैं न कि सिर्फ मस्जिद में या नमाज़ के वक़्त। बल्कि घर में, बाज़ार में, सफ़र में हर जगह होते हैं, यानि “इत्तिफ़ाक़” कभी सिर्फ़ इत्तिफ़ाक़ नहीं होता कि बाल-बाल बचना, अचानक रुक जाना  ये सब अल्लाह की तरफ़ से भेजी हुई हिफ़ाज़त होती है।

7. जब बरकत चुपचाप आने लगे

लोग समझते हैं कि ज़्यादा दौलत या कामयाबी हो तो समझो “बरकत” ख़ूब है लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं क्यूंकि अस्ल में बरकत कुछ और ही है।

وَلَوْ أَنَّ أَهْلَ الْقُرَىٰ آمَنُوا وَاتَّقَوْا لَفَتَحْنَا عَلَيْهِم بَرَكَاتٍ مِّنَ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ

 

और अगर बस्तियों के लोग ईमान लाते और तक़वा इख़्तियार करते तो हम उन पर आसमान और ज़मीन की बरकतें खोल देते।

 

सूरह अल-अअराफ़: 96

इमाम इबने कसीर (रहमतुल्लाह अलैह) इस आयत की तफ़सीर में लिखते हैं कि “बरकातुस-समा” यानि आसमान और ज़मीन की बरकतों का मतलब यहाँ पर वह तमाम ग़ैबी खैर (गैब से मिलने वाली भलाई) है जो दिल को सुकून, ज़िंदगी को आसानी और मुश्किलात को कम कर देती है।

जब कम आमदनी में घर चल जाए, जब मुश्किल आसान लगे, जब दिल को चैन हो, यही वह “smooth life” है जिसे लोग “क़िस्मत” कहते हैं, लेकिन असल में यह अल्लाह की रहमत और बरकत का असर है, और हाँ, बरकत शोर नहीं करती  वो चुपके से आती है ।

सबसे अहम बात

यह याद रखना ज़रूरी है कि फ़रिश्ते खुद से कुछ नहीं करते हर चीज़ सिर्फ अल्लाह के हुक्म से होती है

क़ुरआन कहता है:

 

“वे अल्लाह के हुक्म की नाफ़रमानी नहीं करते।”

 

(Qur’an)

इसलिए असल बात यह नहीं कि “फ़रिश्ते आपके घर में हैं या नहीं” बल्कि असल सवाल यह है क्या आपका घर अल्लाह को पसंद है? अगर अल्लाह को पसन्द है तो ज़ाहिर है फ़रिश्ते आपके घर आएंगे ही |

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