Jannat Kaise Milegi?
4 आसान आमाल जो जन्नत तक पहुँचा सकते हैं
हर मोमिन की सबसे बड़ी तमन्ना क्या है? जन्नत। लेकिन एक अहम सवाल है क्या हर जन्नती का मुक़ाम बराबर होगा? और क्या हर जन्नती को मिलने वाली जन्नत बस एक ही और same दर्जे की होगी? नहीं, क्यूंकि इस्लाम हमें बताता है कि जन्नत के अंदर भी दर्जात (लेवल्स) हैं, और कुछ बंदे ऐसे भी होंगे जो बुलंद और ऊंचे मुक़ाम पर होंगे, जिनको बाकी दुसरे जन्नती ऐसे देखेंगे जैसे हम आसमान में चमकते सितारे देखते हैं। क़ुरआन और हदीस में इन बुलंद और ऊँचे महलों को “अल-गुरफ़” कहा गया है जिनका मतलब है शानदार, बुलंद, रोशन महल। आज हम आपको बताएँगे कि Jannat Kaise Milegi? और 4 आसान आमाल कौन से है,जो जन्नत तक पहुँचा सकते हैं|
जन्नत के 100 दर्जात
सब से पहले तो जान लें कि जन्नत के 100 दर्जात हैं, और इसके बारे में एक हदीस में…
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“जन्नत के 100 दर्जे हैं, और हर दर्जे के बीच का फ़ासला ज़मीन और आसमान के फ़ासले जैसा है।”
(बुख़ारी)
सोचिए…एक दर्जे की जन्नत से दूसरे दर्जे की जन्नत तक इतना बड़ा फ़ासला, कि जिसे इंसानी अकल नाप ही न पाए। और हाँ, यहाँ ये भी बता दूं कि जन्नत का हर दर्जा पिछले से बेहतर होगा। लेकिन अल्लाह की रहमत तो देखिए कि हर जन्नती को अपनी जन्नत में ऐसा लगेगा कि वो सबसे बेहतरीन जगह पर है।
लेकिन यहाँ कुछ ऐसे खास लोगों का ज़िक्र ज़रूर करना चाहिए, जो जन्नत के बुलंद और ऊंचे महलों में होंगे ,जिन महलों का नाम “अल-गुरफ़“होगा। तो चलिए जानते हैं कि जन्नत में अल-गुरफ़ क्या है और ये किस को मिलेगा?
“अल-गुरफ़” का ज़िक्र क़ुरआन में
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
“लेकिन जो लोग अपने रब से डरते रहे, उनके लिए ऊँचे महल हैं, जिनके ऊपर और महल बने होंगे, जिनके नीचे नहरें बहती होंगी।
यह अल्लाह का वादा है, और अल्लाह वादा ख़िलाफ़ी नहीं करता।”
सूरह अज़-ज़ुमर (39:20)
एक और जगह फ़रमाया:
“ये लोग सब्र करने के बदले जन्नत के बुलंद महलों से नवाज़े जाएंगे…”
सूरह अल-फ़ुरक़ान (25:75)
यानि ये मुक़ाम मेहनत, सब्र और नेक आमाल से मिलता है, लेकिन खुशखबरी ये है कि रास्ता बहुत आसान रखा गया है। एक और अहम् बात, इनका मक़ाम ऐसा होगा कि दुसरे जन्नती इन्हें “सितारों” की तरह देखेंगे जिसके बारे में…
नबी ﷺ ने फ़रमाया:
“जन्नत वाले उन ऊँचे कमरों वालों को ऐसे देखेंगे जैसे तुम आसमान में चमकता सितारा देखते हो।”
बुख़ारी, मुस्लिम
यानि जैसे एक साफ़ रात में बाहर निकल कर आसमान देखिए…सितारे कितने दूर, कितने चमकदार दिखते हैं। उसी तरह जन्नती लोग इन बुलंद महलों वालों को देखेंगे। यानी उनका मुक़ाम इतना ऊँचा, इतना रोशन होगा कि बाक़ी जन्नती भी हैरत में होंगे। सहाबा ने पूछा: “या रसूलल्लाह ﷺ, ये महल किसके लिए हैं?” बस यहीं से हमारी ज़िंदगी बदलने वाला जवाब शुरू होता है।

4 आसान आमाल — “अल-गुरफ़ का रास्ता”
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि ये महल उन लोगों के लिए हैं जो ये चार काम करते हैं:
1. नरमी से बात करना
नबी ﷺ ने फ़रमाया: “
जन्नत में ऐसे कमरे हैं जिनका अंदर बाहर से और बाहर अंदर से दिखाई देगा।” सहाबा ने पूछा: “ये किसके लिए?” आप ﷺ ने फ़रमाया: “उनके लिए जो नरमी से बात करें…”
तिर्मिज़ी
क़ुरआन भी कहता है:
“और लोगों से भली बात कहो।”
सूरह अल-बक़रह 2:83
ज़रा सोचिए.. अल्लाह के रसूल ने न तो लंबी चौड़ी इबादतों की शर्त लगायी और न ही मालो दौलत ख़र्च करने को कहा, बस एक छोटी सी शर्त…नरम लहजा। क्यूंकि बीवी से, बच्चों से, वालिदैन से, दुकानदार से, ग़रीब से, नौकर से …आपका बोला हुआ एक सख़्त जुमला उसके दिल को तोड़ देता है। लेकिन एक नर्म जुमला उसके दिल को जोड़ देता है।
2. दूसरा अमल – लोगों को खाना खिलाना
नबी करीम ﷺ से पूछा गया: सबसे बेहतर इस्लाम क्या है? तो आप ﷺ ने फ़रमाया: “खाना खिलाना और सलाम करना।”
📖 बुख़ारी, मुस्लिम
क़ुरआन कहता है: “वे अल्लाह की मुहब्बत में मिस्कीन, यतीम और क़ैदी को खाना खिलाते हैं।”
📖 सूरह अल-इंसान 76:8
अज़ीज़ों ! दुनिया भर में हमारे भाई-बहन भूखे हैं। किसी के पास साफ़ पानी नहीं, तो किसी के पास रोटी नहीं है, तो अगर कभी अल्लाह मौक़ा दे, तो मदद करने में ज़रा भी पीछे न हटना क्यूंकि इससे दिल को सुकून मिलेगा और जन्नत में अपना मक़ाम बनेगा। और अगर आपके पास देने के लिए ज़्यादा रक़म नहीं है बस थोड़े से ही पैसे हैं तो कोई बात नहीं, रक़म छोटी हो या बड़ी, अल्लाह के यहाँ क़ीमत नियत की है। आपका अल्लाह की रज़ा के लिए अपने भाई को रोटी, और एक गिलास पानी देना भी अल्लाह के यहाँ क़ीमती है।
3. पाबंदी से रोज़े रखना
हदीस में आता है:
“हर महीने तीन रोज़े रखना, पूरी उम्र रोज़ा रखने के बराबर है।”
📖 बुख़ारी, मुस्लिम
क्यों? क्योंकि एक नेक काम = दस गुना सवाब (क़ुरआनी उसूल)
और रोज़ा:
• दिल को साफ़ करता है
• नफ़्स को कंट्रोल करता है
• रिया से बचाता है (क्योंकि सिर्फ़ अल्लाह जानता है)
4. रात में नमाज़ पढ़ना (क़ियामुल्लैल / तहज्जुद)
जब दुनिया सो रही हो…आप अल्लाह के सामने खड़े हों। इसे कहते हैं क़ियामुल्लैल / तहज्जुद। इसके लिए ज़रूरी नहीं कि रात भर आप अल्लाह के सामने खड़े रहें थोड़ी देर या २ रकातें भी दिल की हाज़िरी के लिए पढ़ ली जाएँ तो वो काफ़ी हो जाती हैं, इस लिए अगर आपकी आदत नहीं है, तो सिर्फ़ 2 रकअत से शुरू करें। क्यूंकि ये वो वक़्त है, जब बंदा सबसे ज़्यादा अल्लाह के क़रीब होता है। ये इबादत इंसान को जन्नत के सबसे ऊँचे दर्जों तक पहुंचाती है।
हदीस में:
“…और रात में नमाज़ पढ़ें जब लोग सो रहे हों।”
📖 तिर्मिज़ी
क़ुरआन कहता है:
“वे लोग रात के थोड़े हिस्से में सोते थे, और सहरी के वक़्त इस्तिग़फ़ार करते थे।”
📖 सूरह अज़-ज़ारियात 51:17-18
लोग कहाँ ग़लती करते हैं?
• सख़्त ज़बान को मामूली समझते हैं
• सदक़ा सिर्फ़ पैसे तक सीमित समझते हैं
• रोज़े सिर्फ़ रमज़ान तक रखते हैं
• तहज्जुद और रात की नमाज़ को “बुज़ुर्गों का काम” समझते हैं
ये चारों आमाल आसान हैं, लेकिन शैतान हमें टालता रहता है।
कैसे शुरू करें? (Step-by-Step)
1. रोज़ तय करें कि आज किसी से सख़्त बात नहीं करूँगा
2. हफ़्ते में एक बार किसी को खाना खिलाएँ
3. महीने में 3 रोज़े तय कर लें, बेहतर है 13, 14, 15 तारीख़ को रखें
4. हफ़्ते में 2 दिन सिर्फ़ 2 रकअत तहज्जुद
ख़ातिमा और दुआ
ये महल अमीरों, आलिमों या बुज़ुर्गों तक के लिए सिर्फ़ महदूद नहीं है। बल्कि ये आम मुसलमान के लिए भी हैं।
✔ नरम ज़बान
✔ खाना खिलाना
✔ नफ़्ली रोज़े
✔ रात की नमाज़
आसान आमाल — अज़ीम इनाम।
या अल्लाह! हमें अहल-ए-अल-गुरफ़ में शामिल फ़रमा। आमीन।

