Jahannum Me Le Jane Wali 5 Badi Galtiyan |
जहन्नुम में जाने के 5 बड़े असबाब
Jahannum Me Le Jane Wali 5 Badi Galtiyan :अगर आप ये सोचते हैं कि जहन्नुम की आग तो सिर्फ ज़ालिमों या काफ़िरों के लिए है? हमें लगता है कि हम तो आम इंसान हैं, हमारा जहन्नुम से क्या वास्ता! लेकिन ज़रा ठहरिए, और कुरआन उठा कर देखिये जिस्मे 5 असबाब (कारण) बताये गए हैं जो किसी को भी जहन्नुम में पहुँचा देने के लिए काफ़ी हैं वो चाहे मुस्लिम हो या काफ़िर ।
सूरतुल हाक़्क़ा और सूरतुल मुदस्सिर में अल्लाह ने क़यामत के दिन का मन्ज़र दिखाया है, वो मन्जर जिसमे जहन्नमी ख़ुद अपनी ही ज़ुबान से अपने जुर्म बयान कर रहे होंगे, और बता रहे होंगे कि जहन्नुम में कैसे पहुंचे और कौन सी गलतियाँ थीं जो उनको तबाही के दहाने तक ले गयीं।
तो आज हम कुरआन की रौशनी में जहन्नुम में ले जाने वाले उन 5 बड़े असबाब (Jahannum Me Le Jane Wali 5 Badi Galtiyan) पर बात करेंगे, ताकि वक़्त रहते हम गफ़लत से बाहर आ सकें, अपने दिल और अपने आमाल का मुहासबा करें, और जहन्नम की आग से बच सकें |
Jahannum Me Le Jane Wali 5 Badi Galtiyan
ये सिर्फ किताबों की बातें नहीं हैं। ये हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ी हक़ीक़तें हैं। ग़ौर से पढ़िए… हो सकता है इनमे से कोई चीज़ हमारी ज़िंदगी में भी हो।
1. अल्लाह पर ईमान न लाना — तौहीद से दूरी
कुरआन बताता है कि जहन्नुमियों का सब से पहला जुर्म ये होगा कि वो अल्लाह पर ईमान नहीं रखते होंगे वो अल्लाह को एक नहीं मानते होंगे और उनके अन्दर तौहीद का अक़ीदा नहीं होगा
إِنَّهُ كَانَ لَا يُؤْمِنُ بِاللَّهِ الْعَظِيمِ
“बेशक, वो अज़मत वाले अल्लाह पर ईमान नहीं लाता था।”
सूरह अल-हाक़्क़ा (Surah Al-Haqqah), आयत 33
हालाँकि दिल का पूरा भरोसा, उम्मीद और डर सिर्फ अल्लाह के अलावा किसी और जुड़ा हो और इन सब का ताल्लुक़ अल्लाह की जगह दुनिया, पैसा या लोग ले लें, तो यही चीज़ तबाही का जहन्नुम में ले जाने का सबसे बड़ा रास्ता बन जाता है ।
तौहीद का मतलब है:
- दिल का भरोसा सिर्फ अल्लाह पर
- डर सिर्फ उसी का
- उम्मीद उसी से
- मदद उसी से
2. नमाज़ छोड़ देना — दीन से कट जाना
जब जहन्नुमियों से पूछा जाएगा कि वो किस जुर्म में यहाँ आए, तो उनका जवाब होगा:
مَا سَلَكَكُمْ فِي سَقَرَ قَالُوا لَمْ نَكُ مِنَ الْمُصَلِّينَ
तर्जुमा: “(जन्नती पूछेंगे) तुम्हें क्या चीज़ दोज़ख़ (सक़र) में ले आई? वो (जहन्नुमी) कहेंगे: हम नमाज़ पढ़ने वालों में से न थे।”
सूरह अल-मुद्दस्सिर, आयत 42-43
“हम नमाज़ पढ़ने वालों में से नहीं थे।” यानि हम नमाज़ नहीं पढ़ते थे और मुआज्जिन दिन में 5 बार बुलाता था, लेकिन हम अपने कामों में बिजी रहते थे और अल्लाह के बुलावे पर कोई ध्यान नहीं देते थे |
सोचिए… नमाज़ दीन का सुतून (पिलर) है। ऐसा मज़बूत पिलर जिसके ऊपर किसी भी शख्स का ईमान टिका हुआ है तो अगर कोई इस पिलर को रखे ही न, और सिरे से ख़त्म ही कर दे, तो जिस तरह से बगैर पिलर के इमारत नहीं टिक सकेगी और टूट कर ख़त्म हो जाएगी, ऐसे ही जब नमाज़ छूटती है तो इंसान और अल्लाह के बीच का रिश्ता कमजोर हो जाता है क्यूंकि वो मज़बूत पिलर तो उसने बाक़ी ही नहीं रखा।

3. मिसकीनों को खाना न खिलाना — दिल का सख्त हो जाना
وَلَمْ نَكُ نُطْعِمُ الْمِسْكِينَ
“और हम मिस्कीनों (ग़रीबों) को खाना नहीं खिलाते थे।”
सूरह अल-मुद्दस्सिर, आयत 44
कभी कभी जब अल्लाह की नेअमतें इंसान के पास पहुँचती रहती हैं और बगैर मांगे उसकी ज़रूरतें पूरी होती रहती हैं, तो इन्सान गाफ़िल और बेख़बर हो जाता है और दुनिया में इतना उलझा रहता है कि वो दूसरों की ख़बर भी नहीं लेता कि मैंने तो अपना पेट भर लिया लेकिन कहीं मेरे पड़ोसी या ग़रीब रिश्तेदार के बच्चे भूके तो नहीं सोये?
और इस बेख़बरी और गफ़लत से दिल में सख्ती आ जाती है और यही सख्ती बजाये जन्नत के जहन्नम में पहुंचा देती है और उस दिन जहन्नुमी ख़ुद मानेंगे कि हम मिस्कीनों (ग़रीबों) को खाना नहीं खिलाते थे।
यहाँ सिर्फ खाना देना नहीं — बल्कि:
- गरीब की खबर न लेना
- राशन न पहुंचाना
- जरूरत में मदद न करना
- हाल न पूछना
इसका मतलब है कि इंसान के दिल से रहमत निकल गई थी। जबकि इस्लाम सिर्फ इबादत नहीं सिखाता बल्कि इंसानियत, रहम, मदद, हमदर्दी भी सिखाता है।
4. लायानी (बेकार) और फालतू ज़िंदगी — वक्त की बर्बादी
अब बात करते हैं चौथे जुर्म की जो उन्हें दोज़ख़ में ले जाएगा, और वो है अपनी इस अल्लाह की दी हुई क़ीमती ज़िन्दगी को फ़ालतू कामों में ज़ाया करना और ऐसे कामों में बरबाद करना जिसका न दुनिया में कोई फायदा हो और न आख़िरत में कोई फायदा हो। चुनांचे क़ुरान कहता है कि जहन्नमी उस दिन अपने जुर्म का इक़रार करेंगे |
وَكُنَّا نَخُوضُ مَعَ الْخَائِضِينَ
“और हम बेकार (बातिल) बातें बनाने वालों के साथ मिलकर बेकार बातें बनाया करते थे।”
सूरह अल-मुद्दस्सिर, आयत 45
अगर आज के दौर को देखें तो इससे समझ आता है कि घंटों मोबाइल इस्तेमाल करना, रील्स देखना और ग़लत महफ़िलों में गपशप करना इसी बेकार और फ़ालतू ज़िंदगी का हिस्सा है, जहाँ दीन के लिए हमारे पास कोई वक़्त नहीं होता ।
5. क़यामत को झुठलाना — हिसाब का यक़ीन न होना
आखिरी और सबसे खतरनाक जुर्म:
وَكُنَّا نُكَذِّبُ بِيَوْمِ الدِّينِ
“और हम जज़ा-ओ-सज़ा के दिन (यानी क़यामत और हिसाब के दिन) को झुठलाते थे।”
सूरह अल-मुद्दस्सिर, आयत 46
जब इंसान के दिल से ये खौफ़ और अहसास निकल जाए कि उसे मरने के बाद अपने रब को अपनी गुज़ारी हुई अच्छी या बुरी ज़िन्दगी का हिसाब देना है, तो फिर वो किसी भी गुनाह से नहीं रुकता । और शैतान की पकड़ में आसानी से आ जाता है इसलिए आख़िरत का यक़ीन हमारे लिए बहुत ज़रूरी हैं वरना हम किसी भी गुनाह को हलके में लेंगे और शैतान के चंगुल में फँस कर जहन्नम के शिकार बन जायेंगे ।
अपनी ज़िंदगी का मुहासबा कैसे करें? ये गुनाह, गफ़लतें और ग़लतियाँ हो सकता है हमें छोटी लगें, लेकिन ध्यान रहे! यही जहन्नुम के रास्ते हैं ।इसलिए हमें आज ही से अपनी तौहीद को मज़बूत करना चाहिए , नमाज़ों की पाबंदी करनी चाहिए , और जो कुछ अल्लाह ने अता किया है उस में से ग़रीबों की मदद करनी चाहिए और अपने क़ीमती वक़्त को बेकार चीज़ों से बचाकर आख़िरत की तैयारी में लगाना चाहिए ।
नतीजा
जहन्नुम अचानक नहीं मिलती…वो रोज़ की छोटी-छोटी गफलतों का अंजाम होती है। तौहीद से दूरी, नमाज़ में सुस्ती, गरीबों से बेपरवाही, फालतू ज़िंदगी, और आख़िरत से गाफिल रहना, यही वो रास्ते हैं जो इंसान को तबाही तक ले जाते हैं।
दुआ
ऐ अल्लाह!
हमारे दिलों में तौहीद मजबूत कर दे,
हमें नमाज़ का पाबंद बना दे,
हमारे दिलों में गरीबों के लिए रहम पैदा कर दे,
हमें लायानी ज़िंदगी से बचा ले,
और हमें यौम-ए-दीन की सच्ची तैयारी की तौफीक़ दे।
आमीन।

