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Dua Qabool Hone ki 5 Sharten | दुआ कबूल होने की 5 ज़रूरी शर्तें

Dua Qabool Hone ki 5 Sharten

Dua Qabool Hone ki 5 Sharten |

दुआ कबूल होने की 5 ज़रूरी शर्तें

आप कभी कभार सोचते होंगे कि मेरी दुआएं कबूल क्यों नहीं होतीं? क्या अल्लाह तआला मेरी दुआ को सुनते भी हैं ? क्या मेरे अंदर कोई कमी है जिसकी वजह से मेरी आवाज़ अल्लाह तक नहीं पहुँच रही है तो इन सवालों का जवाब पाने के लिए दुआ कबूल होने की 5 ज़रूरी शर्तें (Dua Qabool Hone ki 5 Sharten) आप को ज़रूर मालूम होनी चाहियें | लेकिन उस से पहले यह जान लें कि अल्लाह तआला हर दुआ को सुनते हैं और उसका जवाब भी देते हैं।

अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:

“और जब मेरे बंदे तेरे बारे में पूछें तो (कह दो) मैं क़रीब हूँ, पुकारने वाले की पुकार को जब वह मुझे पुकारता है, तो मैं ज़रूर सुनता हूँ।”
(सूरह अल-बक़रा 2:186)

लेकिन  दुआ के असरदार और कबूल होने के लिए कुछ खास शर्तें होती हैं। हो सकता है कि आपके अंदर वो शर्तें पूरी न हो रही हों, जिसकी वजह से दुआ रोक ली जाती है और क़बूल नहीं हो पाती है, तो आज हम कुरआन और हदीस की रौशनी में दुआ कबूल होने की 5 ज़रूरी शर्तें बताएँगे जो अगर आप अपने अन्दर ले आयें, तो आप भी उन लोगों में शामिल हो जायेंगे जिनकी दुआएं ज़रूर क़बूल होती हैं| तो चलिए शुरू करते हैं|

Dua Qabool Hone ki 5 Sharten

1. रिज़्क़ और कमाई हलाल हो

दुआ की सबसे पहली शर्त है कि कमाई हलाल हो।

इस्लाम में माल कमाना तिजारत करना पसंद किया गया है ताकि आदमी मांगने के बजाये ख़ुद अपने हाथ से कमाकर अपनी और अपने खानदान की ज़िम्मेदारी पूरी करे, और इसकी दलील ख़ुद नबी करीम स.अ. के ज़माने से हमको मिलती है कि उस वक़्त हमारे नबी स.अ. के सहाबा एक से बढ़ कर एक बिजनेसमैन थे तो कुल मिला कर कमाना ना जाएज़ नहीं है लेकिन आप जहाँ से कमा रहे हैं और जिस चीज़ से कमा रहे हैं अगर वो शरी’अत के खिलाफ़ है — जैसे सूद, रिश्वत, चोरी, फरेब जुआ नाप तौल में कमी, तो वह हराम है और उस हराम रिज्क के खाने वाले की दुआ कबूल नहीं होती है

क्यूंकि हदीस में रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“एक आदमी लम्बा सफ़र करता है, बिखरे बाल, गर्दआलूद हालत में हाथ उठाकर कहता है: ‘या रब, या रब!’ लेकिन उसका खाना हराम, उसका पीना हराम, उसका लिबास हराम और उसकी ग़िज़ा हराम है, तो उसकी दुआ कैसे क़बूल होगी?”
(सहीह मुस्लिम, हदीस: 1015)

एक और हदीस में आता है:

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“ऐ लोगों! अल्लाह पाक है और वह सिर्फ पाक चीज़ों को ही क़ुबूल करता है।”
(सहीह मुस्लिम, हदीस 1015)

इसलिए
• अपनी रोज़ी को पाक करें
• अगर कारोबार है तो धोखा, नाप-तौल में कमी और हराम माल से परहेज़ करें
• नौकरी पेशा हैं तो काम में सुस्ती रिश्वत, झूठे दस्तावेज़, या गैर-कानूनी ज़रियों से रिज़्क़ हासिल न करें ये आपके लिए बहुत नुकसानदह है

2. दिल में यकीन हो

दूसरी शर्त है दुआ करते वक्त अल्लाह पर पूरा भरोसा और यकीन होना

दुआ की बुनियाद ही यही है कि बंदा अल्लाह तआला पर तवक्कुल और पूरा भरोसा करे और दिल में यह यक़ीन रखे कि अल्लाह मेरी दुआ को ज़रूर सुनेंगे। लेकिन अगर हम खुद ही शक में मुब्तला हैं कि पता नहीं अल्लाह सुनेंगे या नहीं तो फिर हमारी दुआ कमज़ोर हो जाती है।” और दुआ की रूह निकल जाती है।

क्यूंकि “अल्लाह तआला फ़रमाते है:

मैं अपने बंदे के गुमान के मुताबिक़ होता हूँ।” यानि बंदा मेरे बारे में जैसा सोचता है मैं वैसे ही पेश आता हूँ
(सहीह बुखारी, सहीह मुस्लिम)

इसके बारे में कुरआन कहता है:

“और जब मेरे बन्दे मेरे बारे में पूछें, तो कह दो कि मैं क़रीब हूँ। मैं पुकारने वाले की पुकार को सुनता हूँ जब वो मुझे पुकारे।”
(सूरह अल-बकरा – 2:186)

 

अल्लाह तो साफ़ कहता है:
“मुझसे मांगो, मैं दूँगा।”
(सूरह ग़ाफ़िर – 40:60)

और हदीस में है कि

और नबी पाक ﷺ ने फ़रमाया:
“जब तुम अल्लाह से दुआ करो, तो यकीन से करो कि वह सुन रहा है और जवाब देगा।”
(तिर्मिज़ी)

इसलिए
• दुआ करते वक्त यकीन और भरोसा हो
• दुआ के बाद सब्र इतमिनान रहे
• मायूसी से बचें, क्यूंकि मायूसी कुफ़्र है

Dua Qabool Hone ki 5 Sharten

3. अस्मा-उल-हुस्ना (Asmaul Husna) से दुआ करना 

तीसरी और बेहद खास शर्त है कि अल्लाह को उसके खूबसूरत नामों (अस्मा-उल-हुस्ना) से पुकारना

अल्लाह तआला के 99 खूबसूरत नाम हैं जिनको (असमाउल हुसना) भी कहा जाता है, जिनके ज़रिए हमें दुआ करनी चाहिए, और ऐसा कोई और नहीं बल्कि ख़ुद क़ुरआन कह रहा है: कि

“अल्लाह के लिए अच्छे-अच्छे नाम हैं, इसलिए उसको उन्हीं नामों से पुकारो”
(सूरह अल-अ’राफ़: 180)

जैसे
• या रहमान, या रहीम से जब आप पुकारते हैं तो — रहमत मांग रहे हैं
• या शाफ़ी कह रहे हैं _ तो शिफ़ा तलब कर रहे हैं
• या ग़फ़्फ़ार कह रहे हैं तो — मग़फ़िरत मांग रहे हैं
• या फ़त्ताह कह रहे हैं तो — अपनी मुश्किलों का हल चाह रहे हैं
• या रज़्ज़ाक़ कह रहे हैं तो — रोज़ी में बरकत की दुआ कर रहे हैं

हर नाम अपने आप में एक खासियत रखता है जिस से हमारा मतलब हल हो सकता है इसको छोड़ेंगे तो तो सकता है हमारी दुआ क़बूल न हो इसलिए हर रोज़ कुछ अस्मा-उल-हुस्ना का विर्द करें, दुआ की शुरुआत अल्लाह के नाम से करें और बच्चों को भी अस्मा-उल-हुस्ना याद करवाएं |

4. दिल की हाज़िरी 

चौथी शर्त ये है कि दुआ करते वक़्त दिल ग़ायब नहीं हाज़िर हो

दुआ सिर्फ़ ज़ुबान से पढ़ना काफी नहीं है औए ग़ायब दिमाग़ से मांग लेना काफ़ी नहीं है। असल दुआ तो वो है जिसमें दिल शामिल हो, यानि आप अल्लाह से मांग रहे हैं तो सारा ध्यान अल्लाह की तरफ़ से हो और आपके लहजे में आपकी कैफियत में वो बात आनी चाहिए जो एक मांगने वाले की होती है, और जब इंसान अपने दिल में अल्लाह की अज़मत और शान का एहसास रखकर दुआ करता है, तो वो दुआ और भी असरदार हो जाती है।

नबी ﷺ ने भी फ़रमाया:
“जान लो कि अल्लाह उस दिल से की गई दुआ को क़बूल नहीं करता जो ग़ाफ़िल और बेपरवाह हो।”
(तिर्मिज़ी)

इसका मतलब यह है कि दुआ करते समय हमारा दिल अल्लाह की याद और उसकी कुदरत से भरा होना चाहिए।

5. जल्दबाज़ी न करना

पांचवी शर्त ये है कि दुआ मांगने के बाद जल्दबाज़ी नहीं करना

कई बार हम दुआ करते हैं और सोचते हैं कि नतीजा तुरंत मिल जाए। लेकिन दुआ की कबूलियत अल्लाह की हिकमत पर है, हमारी जल्दबाज़ी पर नहीं। अल्लाह जब चाहेंगे जहाँ चाहेंगे जब हमारे लिए बेहतर समझेंगे उस दुआ की क़बूलियत असर होगा और इसका असर आप अपनी आँखों से देखेंगे |

नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
“तुममें से किसी की दुआ क़बूल होती है, जब तक वह जल्दबाज़ी न करे और कहे – मैंने दुआ की लेकिन मुझे जवाब नहीं मिला।”
(बुख़ारी व मुस्लिम)

इसलिए:

  • दुआ की शुरुआत अलहम्दुलिल्लाह से करिए।
  • फिर नबी ﷺ पर दरूद भेजिए।
  • फिर तवाज़ो और विनम्रता से माँगिये।
  • और आख़िर में फिर अलहम्दुलिल्लाह और दरूद शरीफ़ के साथ खत्म करिये।

याद रखना !

  • कोई भी दुआ बेकार नहीं जाती, कभी फ़ौरन मिलती है और कभी बेहतर वक़्त पर मिलती है, कभी बेहतर चीज़ में बदल दी जाती है, और कभी उस के बदले कोई नुक़सान टाल दिया जाता है।
  • अल्लाह देर तभी करता है जब देर हमारे लिए ज़रूरी होती है और हमें अपने मांगने पे मिलता है लेकिन वक़्त पर
  • दुआ में इस्तिक़ामत भी इबादत है।
  • बार-बार दुआ करना, अल्लाह की रहमत और क़ुदरत पर यक़ीन की निशानी है।
  • अल्लाह अल-मुजीब (दुआ क़बूल करने वाला) है — देर में भी उसकी हिकमत में भलाई होती है।

 नतीजा:

अगर हम हलाल रिज़्क़, यक़ीन, अस्मा-उल-हुस्ना, दिल की हाज़िरी और सब्र के साथ दुआ करें,  तो हमारी दुआ ज़रूर अल्लाह के दरबार में इंशाअल्लाह ज़रूर क़बूल होगी।

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