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An Islamic Reminder | 4 चीजें इंसान को ‘अन्धा’ और ‘बहरा’ बना देती हैं

An Important Islamic Reminder

An Islamic Reminder |

4 चीजें इंसान को ‘अन्धा’ और ‘बहरा’ बना देती हैं

An Islamic Reminder : अल्लाह तआला का निजाम यह है कि इंसान हमेशा “अदल” यानी इंसाफ और बैलेंस पर कायम रहे। लेकिन जब इंसान इस सियासी, समाजी और जज़्बाती जंजाल में उलझ जाता है, अपने दिल और ख्वाहिशों का गुलाम बन जाता है, फिर वो अल्लाह की याद से गाफिल होने लगता है। और जब इंसान अल्लाह से गाफिल हो जाए, तो उसकी सोच का तवाज़ुन (balance) बिगड़ जाता है। और फिर वो हकीकत को वैसे नहीं देख पाता जैसी वो है, बल्कि वैसे देखता है जैसा उसका दिल देखना चाहता है।

यहीं से इंसान की अक्ल पर पर्दे पड़ने शुरू होते हैं। कभी मोहब्बत उसे अंधा कर देती है, कभी नफरत, कभी अंधी अक़ीदत और कभी मजबूरी। यह पोस्ट उन्हीं चार खतरनाक चीज़ों पर रोशनी डालती है जो इंसान की अक्ल, इंसाफ और सोच को “अंधा” और “बहरा” बना देती हैं।

1. अन्धी अक़ीदत (Blind Devotion)

पहली चीज जो इंसान को अंधा करती है, वो है ‘ अन्धी अक़ीदत’।

जब आप के दिल में किसी शख्स, लीडर या पीर की अक़ीदत दिल में घर कर जाए, तो अच्छी बात है होना चाहिए, अच्छे लोगों से अक़ीदत और मुहब्बत होना ही चाहिए, लेकिन अन्धी अक़ीदत से इंसान के दिमाग के दरवाजे बंद हो जाते हैं। और इसी को ‘शख्सियत परस्ती’ भी कहते हैं। और जब ‘शख्सियत परस्ती’ आती है तो एक चीज़ आपके अन्दर आयेगी और वो है हकीकत का इनकार |

यानि जब आप अक़ीदत में अंधे होते हैं, तो अगर कोई आपके लीडर के खिलाफ “दो और दो चार” की तरह वाज़ेह (clear) सबूत भी पेश कर दे, तो आप उसे मानने को तैयार नहीं होते।  आप कहेंगे, “नहीं जी, यह तो साजिश है,” या बातों को घुमाना शुरू कर देंगे। इसे कहते हैं अक़ीदत का नशा। और इसीलिए लोगों का हाल ये है कि उनका लीडर या उनका पीर कितनी भी बड़ी ग़लती कर दे लेकिन वो लोग अपने लीडरों की गलतियों को मानने के बजाय अजीबोगरीब तावीलें (explanations) पेश करते हैं।

याद रखिए, हमने किसी लीडर या पीर का कलमा नहीं पढ़ा। हम मुहम्मदुर रसूलुल लाह के ग़ुलाम हैं इसलिए हमें चाहिए कि हम अक़ीदत की ऐनक उतार कर हकीकत को खुली आँखों से देखें। हमने रसूलुल लाह का कलमा पढ़ा है तो हदीस और कुरान के आईने में ख़ुद को और दूसरों को जांचेंगे |

2. इश्क़ (Infatuation): 

दूसरी चीज जो इंसान को अक़ीदत से भी ज्यादा अंधा कर देती है, वो है ‘इश्क़’।

इश्क़ जो आजकल ग़ैर शादी शुदा ज़्यादातर नौजवान लड़के लड़कियों में  पाया जा रहा है और इसका होना आम बात हो गयी है, लेकिन ये बात भी जान लें कि जब ये भूत सवार होता है तो इंसान की अक्ल पर पर्दा पड़ जाता है, फिर वो एक चीज़ करने लगता है और वो है…गलत फैसले |

यानि जब इंसान पर इश्क़ का भूत सवार होता है, तो वो सही बात समझने की दुनिया से निकल जाता है। बाप समझा रहा होता है कि “बेटा, यहाँ शादी मत करो, यह खानदान हमारे कल्चर से मैच नहीं करता,” या “लड़का नशे का आदी है।” लेकिन इश्क़ में गिरफ्तार इंसान को कुछ सुनाई नहीं देता। उसे तो बस हर हाल में वो चाहिए ही चाहिए |

अंजाम: नतीजा क्या होता है? बर्बादियां। वो लड़का या लड़की जो इश्क़ में अंधे होकर भागते हैं, अपनी ख्वाहिशों को पूरा करने के पीछे वो अपने वालिदैन और अपने ख़ानदान की इज्ज़त को नीलाम कर देते हैं | उन में से ज़्यादातर लोगों का मामला ये है कि बाद में ज़िन्दगी भर पछताते हैं। समाज और वालिदैन भी उन्हें अपनाने से इनकार कर देते हैं।  अल्लाह इन आज़माइशों से बचाए

An Islamic Reminder

3. बुग्ज़ (Hatred)

तीसरी और सबसे खतरनाक चीज़ है “बुग्ज़” — यानी दिल की वो नफरत, जो इंसान से सही-गलत पहचानने की सलाहियत छीन लेती है। यह इश्क़ का अपोजिट है।
जैसे इश्क़ में इंसान को हर चीज़ अच्छी लगने लगती है…वैसे ही बुग्ज़ में हर चीज़ बुरी लगती है। यहाँ तक कि हालत ये हो जाती है कि अगर सामने वाला सही बात भी करे, तब भी दिल मानने को तैयार नहीं होता। और अगर अपना आदमी गलती भी करे, तो उसकी सफ़ाई देने के लिए इंसान बहाने ढूंढने लगता है।

यही वजह है कि बुग्ज़ इंसान के अंदर से “अदल” यानी इंसाफ खत्म कर देता है। अल्लाह तआला ने कुरान में बहुत साफ़ अंदाज़ में फरमाया:

“किसी कौम की दुश्मनी तुम्हें इस बात पर मजबूर न कर दे कि तुम इंसाफ छोड़ दो। इंसाफ करो,

 

यही तक़वे के ज़्यादा करीब है।”

 

(सूरह अल-माइदा: 8)

यानि इस्लाम यह नहीं कहता कि हर किसी से मोहब्बत ही करो…लेकिन यह ज़रूर कहता है कि नफरत में भी इंसाफ मत छोड़ो। आज हम अपने आसपास यही चीज़ बहुत साफ़ देखते हैं। कई बार एक मसलक का आदमी दूसरे मसलक की सही बात को भी नहीं मानता, सिर्फ इसलिए क्योंकि “वो हमारे वाले नहीं हैं।” देवबंदी, बरेलवी, अहले-हदीस, शिया हर तरफ कहीं न कहीं यह बीमारी मौजूद है। उम्मत एक कलिमा पढ़ती है, लेकिन बुग्ज़ ने दिलों को अलग-अलग कर दिया।

4. मजबूरी (Compulsion/Helplessness)

चौथी चीज जो इंसान को हक़ और इन्साफ की बात कहने से रोकती है, वो है ‘मजबूरी’।

कभी-कभी इंसान न इश्क़ में होता है, न बुग्ज़ में, बल्कि वो “मजबूर” होता है। उसकी गर्दन किसी के हाथ में होती है या कोई लालच उसे चुप करा देता है। और सच कहें, तो यह सबसे दर्दनाक हालत है। क्यूंकि यहाँ इंसान को पता होता है कि हक़ क्या है…वो दिल से जानता है कि सही बात कौन सी है… लेकिन फिर भी वो उसे कह नहीं पाता। कभी डर उसकी ज़बान बंद कर देता है…कभी लालच…और कभी किसी का दबाव।

कुरान में अल्लाह तआला फरमाता है:

“जो लोग अल्लाह की नाज़िल की हुई बात को छुपाते हैं और उसके बदले थोड़ी सी कीमत लेते हैं, वो अपने पेट में आग भरते हैं।”

(सूरह अल-बक़रह: 174)

मजबूरी की कई शक्लें हो सकती हैं।

कभी रोटी की मजबूरी होती है।एक सहाफी (Reporter) जानता है कि खबर गलत है, लेकिन नौकरी बचानी है, इसलिए वो वही लिख देता है जो उससे कहलवाया जाता है। कभी कोई आलिम जानता है कि बात हक़ पर नहीं है, लेकिन कुर्सी या तनख्वाह का दबाव उसे खामोश कर देता है।

कभी खौफ की मजबूरी होती है। किसी के पास आपका कोई राज़ हो… कोई कमजोरी… कोई पुरानी फाइल…और फिर उसी डर की वजह से इंसान वो बातें कहने लगता है जो वो खुद भी दिल से नहीं मानता।

और कभी मुफाद की मजबूरी होती है। जो कल तक किसी इदारे या पार्टी के खिलाफ बोल रहा था, आज उसी की तारीफें कर रहा है क्योंकि अब फायदा वहीं से मिल रहा है। आजकल लोग इसे “यू-टर्न” कहकर हल्का बना देते हैं…लेकिन कई बार यह सिर्फ राय बदलना नहीं होता, बल्कि ज़मीर का सौदा होता है।

लेकिन यहाँ एक बहुत जरूरी बात याद रखिए: मजबूरी का सबसे बड़ा इलाज “तवक्कुल अलल्लाह” है। जब इंसान को यह यकीन हो जाए कि “रिज़्क़ देने वाला अल्लाह है… लोग नहीं” तो फिर डर कम होने लगता है। तारीख गवाह है जिन लोगों ने मुश्किल हालात में भी हक़ बात कही, अल्लाह ने उन्हें इज्जत दी। और जिन्होंने थोड़े फायदे के लिए अपना ज़मीर बेच दिया, वो आखिरकार दुनिया में भी रुसवा हुए।

इसका इलाज क्या है? हम ‘बैलेंस’ कैसे लाएं?

अब सवाल यह है कि इन चारों बीमारियों अक़ीदत, इश्क़, बुग्ज़ और मजबूरी  से कैसे बचा जाए? कैसे हम अपनी अक्ल और ईमान को महफूज़ रखें?

1. अक़ीदत और इश्क़ का सही मरकज़ 

अपनी बे-पनाह अक़ीदत और इश्क़ को सिर्फ एक ज़ात के लिए मखसूस (reserve) कर लें, और वो है अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त और उसके प्यारे हबीब (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)। क्यूंकि अल्लाह कभी गलत नहीं हो सकता। और उसके फैसलों में कोई खोट नहीं होता और नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की हर बात हक़ है।

अगर आप यहाँ “अंधे” हो जाएं (यानी बिला-चूँ-चरा इताअत करें), तो यही कामयाबी है। सियासी लीडरों या पीरों के मामले में अंधी अक़ीदत रखना हलाकत है, क्योंकि वो इंसान हैं और उनसे गलती हो सकती है।

2. बुग्ज़ का सही इस्तेमाल

अगर बुग्ज़ रखना ही है, तो शैतान से रखो । अपनी नफसानी ख्वाहिशात से रखो । अपने भाई, दूसरे मसलक के मुसलमान या किसी सियासी मुखालिफ से जाती बुग्ज़ पालकर अपनी आखिरत बर्बाद न करो। इख्तिलाफ (disagreement) रखो, मगर एहतराम के साथ।

3. ज़बान और अखलाक की हिफाज़त

सोशल मीडिया पर किसी को कुत्ता या बंदर बनाकर मीम्स (Memes) शेयर करना, गालियां देना यह एक मोमिन का तरीका नहीं है। मेरे उस्ताद फरमाया करते थे: “मैं किसी को सुधारने के लिए अपने अखलाक खराब नहीं कर सकता।” अगर आप किसी को गाली देकर या ज़लील करके चुप भी करा दें, तो आप जीत नहीं गए, बल्कि आप अखलाकी तौर पर हार गए। ज़बान का गलत इस्तेमाल इंसान को औंधे मुंह जहन्नुम में ले जाएगा।

नतीजा (Conclusion)

मेरे भाइयों और दोस्तों! आज जहाँ हर तरफ झूठ और प्रोपेगेंडा का बाज़ार गर्म है, हमें रुक कर सोचने की ज़रूरत है। क्या हम किसी की अंधी अक़ीदत में मुब्तिला तो नहीं? क्या हम बुग्ज़ की वजह से इंसाफ का दामन तो नहीं छोड़ रहे? या किसी मजबूरी ने हमारी ज़बान सी तो नहीं दी है?

अल्लाह ताला हमें इफरात-ओ-तफरीत (Extremism) से बचाकर एतदाल (Moderation) वाली ज़िन्दगी नसीब फरमाए। आमीन

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