Rizq Me Barkat Kaise Badhe?
रिज़्क़ और उम्र में बरकत कैसे बढ़ाएँ?
क्या आपने कभी गौर किया है… कि कुछ लोग बहुत ज़्यादा कमाते भी नहीं, फिर भी उनकी ज़िंदगी में सुकून होता है, दूसरी तरफ़ कुछ लोग ऐसे होते हैं कि दिन-रात दौड़-भाग करते हैं, ख़ूब मेहनत करते हैं, लेकिन फिर भी हाथ में कुछ नहीं बचता? और ऐसा लगता है जैसे पैसा आता तो है, लेकिन पानी की तरह बह जाता है। न वक़्त में कोई बरकत महसूस होती है और न ही कमाई में वो सुकून मिलता है जिसकी हमें तलाश है। इंसान सोचता रह जाता है कि आख़िर कमी कहाँ रह गई?
तो मेरे दोस्त, कमी हमारी ‘मेहनत’ में नहीं, और न ही हमारी कमाई में है बल्कि कमी हमारी ‘बरकत’ में है। इस्लाम हमें सिखाता है कि असली कामयाबी सिर्फ़ बैंक बैलेंस बढ़ाना नहीं, बल्कि उस रिज़्क़ में अल्लाह की रज़ा और बरकत शामिल करना है।
बरकत क्यूँ ज़रूरी है?
अब सवाल उठता है कि बरकत क्यूँ ज़रूरी है? तो जवाब है कि “बरकत”का मतलब ये नहीं कि चीज़ें बहुत ज़्यादा हों, बल्कि इसका मतलब है कि जो हो, वही काफ़ी हो जाए। और जब बरकत होती है तो
- थोड़ी कमाई भी घर चला देती है
- थोड़े वक़्त में बड़ा काम हो जाता है
- मामूली ज़िंदगी भी खुशगवार लगती है
- कम भी काफ़ी हो जाता है
- ज़िंदगी हल्की और आसान लगने लगती है
- और दिल अल्लाह की नेमतों से भर जाता है
लेकिन ये भी हक़ीक़त है कि जब बरकत नहीं होती तो…
• पैसा आता है, मगर टिकता नहीं
• वक़्त मिलता है, मगर काम पूरा नहीं होता
• सेहत होती है, मगर सुकून नहीं होता
तो आज हम जिस topic पर बात करेंगे, वो सिर्फ़ आपकी रोज़ी-रोटी का मसला हल नहीं करेगा, बल्कि आपकी उम्र और ज़िंदगी में बरकत लायेगा, और दिल को इत्मीनान (सुकून) से भर देगा जिसका वादा हमारे प्यारे नबी (ﷺ) ने किया है।
इस्लाम ने हमें ऐसे उसूल दिए हैं, जो अगर हम अपनाएँ, तो हमारी ज़िंदगी नेमतों और बरकत से भर सकती है। तो चलिए, क़ुरआन और हदीस की रोशनी में उन सुनहरे उसूलों को जानते हैं, जो आपकी दुनिया और आख़िरत, दोनों को मालामाल कर देंगे।” और अगर आप चाहते हैं कि आपकी कमाई सिर्फ़ “आए” नहीं, बल्कि ठहरे भी, तो इस पोस्ट को आख़िर तक ज़रूर पढ़िएगा।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“जो शख़्स चाहे कि उसका रिज़्क़ बढ़ जाए और उसकी उम्र में बरकत हो, तो उसे सिल-ए-रहमी
(रिश्तेदारों से ताल्लुक़ात निभाना) करनी चाहिए।”
(सहीह अल-बुख़ारी 5986, सहीह मुस्लिम 2557)
यह हदीस हमें बताती है कि सिर्फ़ मेहनत नहीं, बल्कि अखलाक़ भी अच्छे हों तो आइए, अब क़ुरआन और हदीस की रोशनी में जानें कि कौन से वो 7 पॉइंट्स है जो रिज्क़ और उम्र में बरकत कैसे बढ़ा सकते हैं ।
1. शुक्र अदा करना – नेमतों को बढ़ाने वाला जादुई अमल

अक्सर हमें जो नहीं मिला, उसका शिकवा करते रह जाते हैं और जो मिला है, उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं। जबकि क़ुरआन का वादा बिल्कुल साफ़ है:
क़ुरआन कहता है:
“अगर तुम शुक्र अदा करोगे तो मैं तुमको ज़्यादा दूँगा, और अगर तुमने कुफ़्र किया तो मेरा अज़ाब सख़्त है।”
(सूरह इब्राहीम: 7)
शुक्र का मतलब सिर्फ़ ज़बान से ‘अल्हम्दुलिल्लाह’ कह देना नहीं है, बल्कि दिल से यह मानना है कि मेरे पास जो भी हुनर, सेहत या दौलत है, वो मेरा कमाल नहीं, बल्कि मेरे रब का फ़ज़ल है। और जब हम अल्लाह की नेमतों पर शुक्र अदा करते हैं – चाहे वो माल हो, सेहत हो, औलाद हो या वक़्त, तो अल्लाह उन नेमतों को और बढ़ा देता है। और बरकत का असली मतलब यही है कि कम चीज़ भी काफ़ी हो जाए और ज़्यादा कभी बेकार न जाए।
2. गुनाहों से बचना और तौबा करना– रुकावटें हटाने का रास्ता
गुनाह, इंसान की ज़िंदगी से बरकत को ऐसे खींच लेते हैं जैसे दीमक लकड़ी को खा जाती है। हराम तरीक़े से कमाया हुआ ढेर सारा पैसा भी दिल को वो सुकून नहीं दे सकता जो हलाल की सूखी रोटी में मिलता है। लेकिन मायूस न हों, क्योंकि
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“आदम की औलाद सब गुनाहगार है, और गुनाहगारों में सबसे बेहतर वो हैं जो तौबा करने वाले हैं।”
📖 (सुन्नन तिर्मिज़ी 2499, हसन)
अपनी ग़लतियों की माफ़ी मांगना आपके रिज़्क़ के दरवाज़े दोबारा खोल देता है। बार-बार तौबा करना, गुनाह से बचने की कोशिश करना, और अल्लाह से रहमत माँगना रिज़्क़ को पाक और ज़िंदगी को आसान बनाता है।
3. इस्तिग़फ़ार – बरकत की कुंजी
क्या आप जानते हैं कि ‘इस्तिग़फ़ार’ (अस्तग़फ़िरुल्लाह पढ़ना) सिर्फ़ माफ़ी के लिए नहीं, बल्कि दुनियावी दौलत के लिए भी है? सूरह नूह में अल्लाह ने साफ़ लफ़्ज़ों में बताया है कि अपने रब से माफ़ी मांगो, वो तुम पर आसमान से मुसलाधार बारिश बरसाएगा और तुम्हारे माल और औलाद में इज़ाफ़ा (बढ़ोत्तरी) करेगा।
हज़रत नूह (अ.स.) ने अपनी क़ौम से फ़रमाया:
“अपने रब से माफ़ी माँगो, बेशक वो बड़ा बख़्शने वाला है। वो तुम पर आसमान से बारिश बरसाएगा, और माल व औलाद
अता करेगा, और तुम्हारे लिए बाग़ात और नहरें बनाएगा।”
(सूरह नूह: 10–12)
जब हम कसरत से इस्तिग़फ़ार करते हैं, तो ज़िंदगी की मुश्किलें आसान होने लगती हैं और रिज़्क़ वहाँ से आता है जहाँ से हमारा गुमान भी नहीं होता।
4. तहज्जुद और दुआ – नेमतों का राज़ी लम्हा
दिन भर हम दुनिया के पीछे भागते हैं, लेकिन रात का एक हिस्सा ऐसा है जब रब हमें पुकारता है। जिसके बारे में रसूलुल्लाह (ﷺ) ने बताया कि रात के आख़िरी पहर अल्लाह आसमान-ए-दुनिया पर आता है और पूछता है:
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“हमारा रब हर रात आसमान-ए-दुनिया पर उतरता है, जब रात का आख़िरी तिहाई हिस्सा बाक़ी रहता है और फ़रमाता है: कौन है जो मुझसे दुआ करे कि मैं उसकी दुआ क़बूल करूँ?”
📖 (सहीह बुख़ारी 1145, सहीह मुस्लिम 758)
तहज्जुद वो वक़्त है जब रिज़्क़ में बरकत, दिल में सुकून और दुआओं की क़बूलियत होती है।
क़ुरआन कहता है:
“रात के कुछ हिस्से में नमाज़ पढ़ा करो, ये तुम्हारे लिए नफ़्ल है, शायद तुम्हारा रब तुम्हें मक़ाम-ए-मह्मूद पर क़ायम कर दे।”
📖 (सूरह बनी इस्राईल: 79)
5. इनकिसारी – घमंड से दूर रहना
दौलत, कामयाबी, ताक़त और शोहरत अक्सर इंसान को जब मगरूर (घमंडी) बना देते है, तो वो बरकत से महरूम हो जाता है। और याद रखिए, तक़ब्बुर (घमंड) अल्लाह को सख़्त नापसंद है। क़ुरआन हमें याद दिलाता है कि ज़मीन पर अकड़ कर मत चलो।
क़ुरआन कहता है:
“और ज़मीन पर अकड़ कर मत चलो। तुम न तो ज़मीन को फाड़ सकते हो और न पहाड़ों की ऊँचाई को पहुँच सकते हो।”
📖 (सूरह बनी इस्राईल: 37)
जब आप इनकिसारी अपनाते हैं, तो अल्लाह आपको बुलंद करता है और आपके माल में बरकत डाल देता है।
6. सदक़ा और ख़ैरात – माल को बढ़ाने वाला अमल

गणित (Maths) कहता है कि देने से दौलत घटती है, लेकिन इस्लाम कहता है कि देने से दौलत बढ़ती है। हज़ूर (ﷺ) ने फ़रमाया है कि “सदक़ा देने से माल कभी कम नहीं होता।”
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“सदक़ा देने से माल कभी कम नहीं होता।”
📖 (सहीह मुस्लिम 2588)
सदक़ा आपके माल की गंदगियों को साफ़ करता है और आने वाली बलाओं को टाल देता है। यहाँ तक कि ग़ैर-मुस्लिम भी यह मानते हैं कि दान (Charity) करने से बरकत आती है। जब हम अल्लाह की राह में देते हैं, तो असल में हमारा माल बढ़ता है। सदक़ा से ग़रीबों की मदद होती है, दिल में सुकून आता है ।
7. सिला-ए-रहमी – रिश्तों को निभाना
और आख़िर में वो नुस्खा जो बहुत कम लोग जानते हैं। अगर आप चाहते हैं कि आपकी उम्र लंबी हो और रिज़्क़ कुशादा हो, तो अपने रिश्तेदारों से ताल्लुक़ात जोड़िए। और हाँ, असली सिला-ए-रहमी यह नहीं कि “उसने शादी में बुलाया तो मैं भी बुलाऊँगा।” बल्कि असली सिला-ए-रहमी यह है कि जो आपसे रिश्ता तोड़े, आप उससे भी रिश्ता जोड़ें। माँ-बाप, भाई-बहन और रिश्तेदारों का हक़ अदा करना आपकी ज़िंदगी में ऐसी बरकत लाएगा जो आप अपनी आँखों से देखेंगे।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“सिला-ए-रहमी करने वाला वो नहीं जो सिर्फ़ बदले में ताल्लुक़ निभाए। असल सिला-ए-रहमी करने वाला वो है,
जो रिश्तेदारों से ताल्लुक़ रखे, जब वो उससे तोड़ लें।”
📖 (सहीह बुख़ारी 5991)
माँ-बाप, भाई-बहन, औलाद, चाचा-चाची, दादा-दादी – सब रिश्तों को निभाना ज़िंदगी में बरकत लाता है। हो सकता है कि हर रिश्ता आसान न हो, लेकिन अल्लाह के लिए निभाना असली सिला-ए-रहमी है।
क्या हमारा रिज्क़ पहले से लिख दिया गया है?
हाँ, एक फ़रिश्ता माँ के पेट में ही लिख देता है कि कौन कितनी ज़िंदगी जिएगा और कितना कमाएगा। (सहीह मुस्लिम 2643) लेकिन अल्लाह के पास लौह-ए-महफ़ूज़ (Master Record) है, जहाँ सब कुछ पहले से दर्ज है। अल्लाह जानता है कि कौन दुआ करेगा, कौन सिला-ए-रहमी निभाएगा, और उसी हिसाब से उसके रिज़्क़ और उम्र में बरकत कर दी जाती है।
नतीजा (Conclusion): असली अमीरी क्या है?
मेरे दोस्तो! असली अमीरी बैंक बैलेंस का नाम नहीं, बल्कि दिल के सुकून और अल्लाह की दी हुई बरकत का नाम है। मेहनत जारी रखिए, लेकिन इन 7 रूहानी उसूलों को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लीजिए, इंशाअल्लाह आप देखेंगे कि आपकी दुनिया और आख़िरत दोनों सवर जाएँगी।
अल्लाह हम सबकी ज़िन्दगी को आसान बनाये और रिज्क़ में बरकत और आसानी लाये, आमीन|

