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5 Khaas Nematein Ramzan Me | रमज़ान में नबी (ﷺ) की इबादत का तरीक़ा

5 Khaas Nematein Ramzan Me

5 Khaas Nematein Ramzan Me |

रमज़ान में नबी (ﷺ) की इबादत का तरीक़ा

जब रमज़ान का महीना आता है तो जैसे रहमत, मग़फ़िरत और बरकतों का मौसम आ जाता है। हर तरफ़ से नूर की बारिश होने लगती है, लेकिन ज़रा ठहरिये, क्या आप जानते हैं कि इस मुबारक महीने में अल्लाह तआला ने इस उम्मत को कौन सी ख़ास नेअमतें अता की हैं जो किसी और उम्मत को नहीं मिलीं? और क्या हमें पता है कि हमारे नबी,(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) का रमज़ान में इबादत का क्या मामूल (Routine) हुआ करता था?

आज इस पोस्ट में हम तफ्सील से जानेंगे “5 Khaas Nematein ramzan me” यानि वो 5 अज़ीम तोहफ़े जो हर रोज़ेदार के लिए अल्लाह की तरफ़ से खास इनाम के तौर पर मिलते हैं। और यह भी समझेंगे कि नबी-ए-करीम ﷺ रमज़ान में किस तरह इबादत का एहतमाम फरमाते थे और ये भी कि हम अपनी ज़िंदगी में उस सुन्नत को कैसे अपना सकते हैं। तो अगर आप सच में इस रमज़ान को अपनी ज़िंदगी का बेहतरीन रमज़ान बनाना चाहते हैं, तो ये पोस्ट सिर्फ़ आपके लिए है।

रमज़ान में नबी करीम स.अ. का तरीका 

नबी स.अ. के दौर में जब रमज़ान शुरू होता था, तो आप (ﷺ) इबादत का बहुत ख़ास एहतमाम फरमाते थे। रिवायतों से पता चलता है कि यह महीना नबी (ﷺ) के लिए एक आम महीने जैसा बिल्कुल नहीं होता था।इस में आप (ﷺ) की इबादतों का शौक़, नमाज़ों में खुशू-ओ-खुज़ू (ध्यान) और अल्लाह के सामने गिड़गिड़ाना,आम दिनों के मुकाबले कई गुना बढ़ जाता था।और आप स.अ. इबादत में पूरी ताक़त लगा देते थे, रातों को ज़्यादा जागते थे, बिस्तर से दूर रहते। और ये कोई एक-दो दिन की बात नहीं थी। बल्कि पूरे रमज़ान यही मामूल था।

अब हमें सोचना चाहिए कि रमज़ान में  हमारे रूटीन में कोई तब्दीली आई ? क्या इबादतों में कोई इज़ाफ़ा हुआ ? या बस इफ्तार और सहरी के बाद आराम ही करते हैं, याद रखिये! नबी ﷺ के लिए रमज़ान आराम का महीना बिल्कुल नहीं था, बल्कि यह मेहनत और मुजाहदा का महीना था, और अल्लाह से क़रीब होने का महीना था। इसलिए बेहतर तो ये है कि रमज़ान शुरू होते ही हमारी रोज़मर्रा की रूटीन में भी एक तब्दीली आनी चाहिए।5 Khaas Nematein Ramzan Me

रमज़ान के आख़िरी अशरे में नबी स.अ. की इबादत 

रमज़ान के पूरे महीने बल्कि खासकर आखिरी दस रातों में आप ﷺ बिस्तर पर सोने के लिए नहीं आते थे।

सही मुस्लिम की हदीस में हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा बयान फरमाती हैं:

 

“जितना एहतमाम और मेहनत नबी ﷺ आखिरी दस रातों में फरमाते, उतनी इबादत पहले किसी और वक्त में नहीं होती थी।”

यानि इबादत का यह आलम होता था कि रमज़ान के खत्म होने तक आप स.अ. रात को सोने के लिए बिस्तर पर तशरीफ़ नहीं लाते थे। ज़रा सोचिए! वो नबी जिनके अगले-पिछले सब कुछ अल्लाह ने मुआफ फरमा दिए थे, वो रमज़ान की रातों में इतनी इबादत करते थे कि बिस्तर ही छोड़ देते थे। और एक हम हैं कि सहरी खा कर ही सो जाते हैं और अगर नमाज़ पढ़ भी लेते हैं तो नमाज़ के फ़ौरन बाद सो जाते हैं और सुबह की बरकतों से महरूम रह जाते हैं |

5 Khaas Nematein Ramzan Me |

रमज़ान का रोज़ा – अल्लाह की पाँच खास नेमतें

मुसनद अहमद, हदीस नंबर 7904 में हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि रसूल अकरम ﷺ ने इरशाद फरमाया:

“मेरी उम्मत को रमज़ान मुबारक में अल्लाह तआला ने पाँच ऐसी नेमतें अता फरमाई हैं जो पहले किसी भीउम्मत को नहीं मिलीं।”

तो चलिए! इन पाँचों नेमतों को तफसील से समझते हैं

 नेमत नंबर 1 — रोज़ेदार के मुँह की खुशबू

नबी ﷺ ने फरमाया कि रोज़ेदार के खाली पेट से जो खुशबू उठती है, वो अल्लाह को मुश्क से भी ज़्यादा पसंद है। ज़रा सोचिए.. जब आप भूखे-प्यासे रहते हैं अल्लाह की रज़ा के लिए, तो वो खुशबू जो शायद आपको खुद पसंद न हो, लेकिन अल्लाह के नज़दीक मुश्क (Musk/कस्तूरी) से भी बढ़कर है।

सुब्हानल लाह! दुनिया वालों को शायद वो अजीब लगे, लेकिन अल्लाह की बारगाह में हमारे खाली पेट की महक अल्लाह को महबूब है। इसलिए जब रोज़े के दौरान भूख और प्यास तकलीफ दे, तो उसवक्त ये दिल में रखना कि: “मेरे अल्लाह को मेरा ये हाल पसंद है।”

नेमत नंबर 2 — इफ़्तार तक फरिश्तों की दुआ

हदीस में आया है कि जब तक रोज़ेदार इफ्तार नहीं करता, फरिश्ते मुसलसल उसके लिए मग़फिरत (बख्शिश की दुआ) और

रहमत की दुआ माँगते रहते हैं।

अब बताइए … वो पाक फरिश्ते जो कभी गुनाह नहीं करते, जो हमेशा अल्लाह की तसबीह में मसरूफ हैं, वो आपके लिए दुआ माँग रहे हैं! एक रोज़ेदार के लिए ये कितना बड़ा शरफ है। तो जब आप सहरी के बाद रोज़े की नियत करें, तो ये याद रखें कि अब फरिश्ते पूरा दिन आपके साथ हैं

नेमत नंबर 3 — रोज़ाना जन्नत का सजना

अल्लाह तआला हर रोज़ रमज़ान में जन्नत को सजाते और सँवारते हैं और जन्नत से मुखातिब होकर फरमाते हैं:

“अनकरीब मेरे बंदे मुशक्कत और तकलीफ से निकलकर तुम्हारे पास आने वाले हैं।”

यानि हर रोज़ अल्लाह जन्नत को तैयार करते हैं, आपके लिए, मेरे लिए, और हर उस बंदे के लिए जो उनकी राह में रोज़ा रखता है।दुनिया में कितनी भी तकलीफें आयें, लेकिन आख़िर में जन्नत का इनाम उन सब तकलीफों से बढ़कर है। अल्लाह हमें उन खुशनसीब बंदों में शामिल फरमाए। आमीन!

नेमत नंबर 4 — शैतानों को क़ैद करना

रमज़ान में सरकश शैतानों को बाँध दिया जाता है। जितना वो रमज़ान के बाहर गुमराह करते थे, उतना अब नहीं कर सकते। जितना वो आम दिनों में इंसानों को गुमराह कर सकते थे, रमज़ान में वहां तक नहीं पहुँच सकते। अल्लाहु अकबर! ये एक बहुत बड़ी नेअमत है कि शैतान के शर से आज़ाद हो जाते हैं इसीलिए रमज़ान में नेकी आसान लगती है, इबादत में मन लगता है, और बुरे ख्याल कम आते हैं, ये अल्लाह की खास रहमत है। लेकिन फिर भी अगर इस महीने भी हम गुनाह करें, तो समझ लें कि वो हमारा अपना नफ्स है — शैतान नहीं।
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नेमत नंबर 5 — आखिरी रात में मग़फिरत

पांचवीं सबसे खास नेमत यह है कि

रमज़ान की आखिरी रात में रोज़ेदार के सारे गुनाहों को माफ़ कर दिया जाता है। अल्लाहु अकबर! सहाबा र.अ. ने पूछा: “या रसूल अल्लाह (ﷺ)! क्या ये आखिरी रात ‘शब-ए-कद्र’ (लैलतुल कद्र) है?” आप (ﷺ) ने फरमाया: “नहीं! बल्कि कायदा यह है कि जब मज़दूरी करने वाला अपनी मज़दूरी मुकम्मल कर लेता है, तो काम खत्म होने पर उसे उसकी उजरत (Wages/मेहनताना) दे दी जाती है।” यानी रमज़ान की आखिरी रात मज़दूरी मिलने की रात है!

ये रात ईद के पहले वाली होती है जिसको “लैलतुल जाइज़ह” कहा जाता है जिसमें पूरे महीने रोज़े रखने की उजरत मिलती है। ये शब-ए-क़द्र नहीं, बल्कि रमज़ान की आखिरी रात है और इसकी अलग फज़ीलत है।

बहुत से लोग सोचते हैं कि आखिरी रात चांद रात है और इसमें कोई इबादत नहीं। लेकिन नबी-ए-पाक (ﷺ) ने इसे “मज़दूरी मिलने की रात” कहा है। जिस तरह एक मज़दूर काम पूरा होने पर उजरत पाता है, वैसे ही अल्लाह पूरे महीने के रोज़ों के बदले आखिरी रात में अपने बंदों की मुकम्मल मग़फ़िरत फरमा देता है। इसलिए  ईद की तैयारियों में वक़्त बरबाद न करें क्योंकि आखिरी रात की मग़फिरत आपका इंतज़ार कर रही है। जिसकी हम सबको हर चीज़ से ज़्यादा ज़रुरत है |

सुन्नत रूटीन को कैसे अपनाएं? (Step-by-Step)

1. हिम्मत बांधें: जैसे ही रमज़ान का चांद नज़र आए, ज़हनी तौर पर खुद को तैयार करें कि यह महीना सिर्फ अल्लाह के लिए है। फालतू मसरूफियत कम कर दें।
2. नींद की कुरबानी: अपनी नींद को थोड़ा कम करें। रातों को उठकर तहज्जुद और ज़िक्र का एहतमाम करें।
3. रोज़े की हिफाज़त: रोज़े का मतलब सिर्फ भूखे रहना नहीं है, बल्कि ज़बान, आंख और कानों का भी रोज़ा रखना है ताकि फरिश्तों की दुआएं इफ़्तार तक मिलती रहें।
4. आखिरी 10 दिनों का एहतमाम: आखिरी 10 रातों में दुनियावी काम समेट लें और अगर मुमकिन हो तो एतिकाफ़ में बैठें या कम से कम इन रातों में जागकर इबादत करें।
5. चांद रात की हिफाज़त: ईद की तैयारियां पहले से कर लें ताकि मज़दूरी मिलने वाली रात को आप मुसल्ले पर अल्लाह के सामने दुआ मांगते हुए गुज़ारें।

आखिरी पैग़ाम और दुआ

मेरे अज़ीज़ दोस्तो, रमज़ान का मुकद्दस महीना अल्लाह का वो खास इनाम है जिसकी मिसाल नहीं मिलती। नबी-ए-अकरम (ﷺ) की इबादत, फरिश्तों का हमारे लिए दुआएं करना, जन्नत का रोज़ाना सजना और आखिरी रात में हमारी मग़फ़िरत का परवाना मिल जाना, ये सब हमारे लिए बहुत बड़ा तोहफ़ा है। इसे दुनिया की फानी चीज़ों के लिए हरगिज़ बर्बाद न करें।

ए अल्लाह! हमें रमज़ान मुबारक की कद्र करने की तौफीक अता फरमा। हमें नबी-ए-पाक (ﷺ) की सुन्नतों पर चलने वाला बना दे। हमारी इबादतों, और टूटे-फूटे रोज़ों को कबूल फरमा और उस आखिरी रात में हमें भी अपनी रहमत से उन लोगों में शामिल फरमा जिन्हें तू मुकम्मल मज़दूरी और मग़फ़िरत अता फरमाता है। आमीन या रब्बुल आलमीन!

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